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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 342 of 639

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Page 342

३२४ चरकसंहिता [ अ० २७
फाणित [ राव ] वात, पित्त, कफ इन को बढ़ाता है, दही सूजन को उत्पन्न
करता है। पिण्याक (तिलकल्क) और हरे शाक प्रसन्नता का नाश करते हैं।
उड़द की दाल मल को विशेष रूप से उत्पन्न करती है। क्षार नेत्र और शुक्र
को नाश करते हैं। अनार और आंवले को छोड़ कर प्रायः सब अम्ल पित्तका-
रक हैं। मधु और पुराने चावल, जौ और गेहूं को छोड़कर प्रायः करके मधुर
रस कफकारक होता है, बेंत के अग्रिम भाग और परवल को छोड़ प्रायः करके
सब तिक्त रस वायुकारक और शुक्रनाशक होते हैं। पिप्पली और सोंठ को छोड़
कर प्रायः करके सब कटु रस वायुकारक तथा शुक्रनाशक हैं ॥ ४ ॥
परमतो वर्गसंग्रहेणाहारद्रव्याण्यनुव्याख्यास्यामः ॥ ५ ॥
शूकधान्य-शमीधान्य-मांस-शाक-फलाश्रयान् ।
वर्गान् हरित-मद्याम्बु-गोरसेक्षु-विकारिकान् ॥ ६ ॥
दश द्वौ च परौ वर्गौ कृतान्नाहारयोगिनाम् ।
रसवीर्यविपाकैश्च प्रभावैश्च प्रचक्ष्महे ॥ ७ ॥
इस के आगे वर्गक्रम से आहार पदार्थों की व्याख्या करेंगे। यथा—शूक-
वर्ग, शमीधान्यवर्ग, मांसवर्ग, शाकवर्ग, फलवर्ग, हरितवर्ग, मद्यवर्ग, अम्बुवर्ग,
गोरसवर्ग, इक्षुविकारवर्ग, कृतान्नवर्ग और आहारयोगवर्ग । इन बारह वर्गों में
सब द्रव्यों के रस, वीर्य, विपाक और प्रभाव का वर्णन करेंगे ॥ ५-७ ॥
अथ शूकधान्यवर्गः-
रक्तशालिर्महाशालिः कलमः शकुनाहृतः ।
तूर्णको दीर्घशूकश्च गौरः पाण्डुकलाङ्गलौ ॥ ८ ॥
सुगन्धिका लांग्वालाः शारीवाख्याः प्रमादकाः ।
पतङ्गास्तपनीयाश्च ये चान्ये शालयः शुभाः ॥ ९ ॥
शीता रसे विपाके च मधुराः स्वल्पमारुताः ।
बद्धाल्पवर्चसः स्निग्धा बृंहणाः शुक्रमूत्रलाः ॥ १० ॥
रक्तशालिर्वरस्तेषां तृष्णाघ्नास्त्रिमलापहः ।
महांस्तस्यानु कलमस्तस्याप्यनु ततः परे ॥ ११ ॥
यवका हायनाः पांशुवाप्या नैषधकादयः ।
शालीनां शालयः कुर्वन्त्यनुकारं गुणागुणैः ॥ १२ ॥
शीसः स्निग्धोऽगुरुः स्वादुस्त्रिदोषघ्नः स्थिरात्मकः ।
षष्टिकः प्रवरो गौरः कृष्णगौरस्ततोऽनु च ॥ १३ ॥
वरकोद्दालकौ चीन-शारदोज्ज्वल-दर्दुराः ।