चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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संपद्विरुद्धं तद्विद्यादसंजातरसं तु यत् ।
अतिक्रान्तरसं वाऽपि विपन्नरसमेव वा ॥ ९९ ॥
ज्ञेयं विधिविरुद्धं तु भुज्यते निभृतेन यत् ।
तदेवंविधमन्नं स्याद्विरुद्धमुपयोजितम् ॥ १०० ॥
सात्म्यतोऽल्पतया वाऽपि दीप्ताग्नेस्तरुणस्य च ।
स्नेह-व्यायाम-बलिनो विरुद्धं वितथं भवेत् ॥ १०१ ॥
षाण्ढ्यान्ध्य-वीसर्प-दकोदराणां विस्फोटकोन्माद-भगन्दराणाम् ।
मूर्च्छा-मदाध्मान-गलामयानां पाण्ड्वामयस्याऽऽम-विषस्य चैव ॥१०२॥
किलास-कुष्ठ-ग्रहणी-गदानां शोषास्र-पित्त-ज्वर-पीनसानाम् ।
संतानदोषस्य तथैव मृत्योर्विरुद्धमन्नं प्रवदन्ति हेतुम् ॥ १०३ ॥
जो भोजन दोषों को विशेष रूप में कुपित करके शरीर से बाहर नहीं करता,
अर्थात् कुपित अवस्था में शरीर में ही रहने देता है वह सब अन्न अहितकारी
होता है। इसी प्रकार देश, काल, अग्नि, सात्म्य, वायु आदि दोष, संस्कार
वीर्य, कोष्ठ, अवस्था, क्रम, परिहार, उपचार, पाक, संयोग, हृत्-संपत् और विधि
में जो द्रव्य विरोधी हों, वे अहितकारी हैं । मारवाड़ आदि निर्जल देशों में रूक्ष,
तीक्ष्ण पदार्थ; जलबहुल ( बंगाल आदि ) प्रदेश में स्निग्ध और शीत पदार्थों का
सेवन करना देशविरुद्ध है । इसी प्रकार शीत ऋतु में शीत और रूक्ष पदार्थों का
सेवन या उष्णकाल में कटु और उष्ण पदार्थों का सेवन कालविरुद्ध है। अग्नि के
विषम, मन्द या तीक्ष्ण या सम इन चार प्रकार की जाठराग्नि में विरोधी अन्नपान
(यथा-तीक्ष्णाग्नि में मन्द आहार और मन्दाग्नि में गुरु आहार करना) विरोधी है। मधु
और घी एकसमान मात्रामे परस्पर विरोधी हैं। जिस पुरुषको कटु, उष्ण आदि वस्तुओं
का सात्म्य हो, वह यदि मधुर और शीत पदार्थ सेवन करे तो यह सात्म्य-विरोधी
है । समान गुणों के अभ्यास के विरुद्ध जो आहार है वह वायु आदि दोषों का
भी विरोधी है। एरण्ड की कड़छी से पकाया हुआ मोर का मांस विष के समान
होने से संस्कार-विरुद्ध है। जो वस्तु शीतवीर्य हो उस को यदि उष्णवीर्य की
वस्तु के साथ मिलाकर खाया जाये तो यह वीर्य-विरोधी है। क्रूरकोष्ठ वाले
पुरुष को थोड़ा, मृदुवीर्य अथवा अरेचक पदार्थ देना और मृदुकोष्ठ वाले
पुरुष को गुरु, बहुत अथवा रेचक पदार्थ देना, कोष्ठविरोधी है। परिश्रम,
मैथुन, स्त्रीसंग और व्यायाम में लगे हुए पुरुष को वायुकोपक आहार देना
या निद्राशील, आलसी पुरुष को कफकोपक भोजन देना अवस्थाविरुद्ध
जो मल मूत्र का त्याग किये बिना, बिना भूख के खाना, अथवा बहुत की