चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in contextअ० २६ ] सूत्रस्थानम् ३१७
प्रकाराणि चान्यानि सर्वं चाम्लं द्रवमद्रवं च पयसा सह विरुद्धम्। तथा
कङ्गुवनक-मकुष्ठक-कुलत्थ-माष-निष्पावाः पयसा सह विरुद्धाः। पद्मोत्त-
रिकाशाकं शार्करो मैरेयो मधु च सहापयुक्तं विरुद्धं वातं चातिकोपयति।
हारिद्रकः सर्षप-तैल-भृष्टो विरुद्धः पित्तं चातिकोपयति। पायसो मन्था-
नुपानो विरुद्धः श्लेष्माणं चातिकोपयति। उपोदिका तिलकल्कसिद्धा
हेतुरतीसारस्य। बलाका वारुण्या सह कुल्माषैरपि विरुद्धा। सैव
सूकरवसापरिभृष्टा सद्यो व्यापादयति मायूर-मांसमेरण्ड-सीसकावस-
क्तमेरण्डाग्नि-प्लुष्टमेरण्ड-तैल-युक्तं सद्यो व्यापादयति तदेव भस्मपांसु-
परिव्वस्तं सक्षौद्रं मरणाय। हारांतकमांसं १हारिद्रसीसकावसक्तं हारिद्रा-
ग्निप्लुष्टं सद्यो व्यापादयति। तदेव भस्मपांशुपारध्वस्तं सक्षाद्रं मरणाय
मत्स्यांनेस्तालनसिद्धाः पिप्पल्यस्तथा काकमाची मधु च मरणाय;
मधु चोष्णमुष्णार्तस्य च मधु मरणाय। मधुसर्पिषी समघृते; मधु वारि
चान्तरिक्षं समघृतं, मधुपुष्करबीजं, मधु पांत्वाष्णोदकं, भल्लातकाष्णो-
दकं; तक्रसिद्धः कम्पिल्लकः, पर्युषिता काकमाची, अङ्गारशूल्या भास-
श्चेति विरुद्धानि-इत्येतद्यथाप्रशमभिनिर्दिष्टं भवतीति ॥८२॥
भगवान् आत्रेय ने कहा—यह ठीक नहीं। सभी मछलियों को दूध के साथ
नहीं खाना चाहिये, परन्तु खासकर चिलचिम मछली को तो कभी भी नहीं खाना
चाहिये। क्योंकि यह मछली (चिलचिम) बहुत अभिष्यन्द करने वाली है,
इसलिये भयंकर बड़े २ रोगों को और आमविष को उत्पन्न करती है। ग्राम्य,
आनूप और जलचर प्राणियों का मांस, मधु, तिल, गुड़, दूध, उड़द, मूली,
भिस, नाल, अंकुरित धान्यों के साथ एक साथ नहीं खाना चाहिये। इन के
साथ में खाने से बहरापन, अन्धत्व, कम्पन, जड़ता, अव्यक्त उच्चार (मिन्मिन)
गूंगापन, नाक से बोलना, अथवा मरण तक हो सकता है। पुष्करपत्र के शाक
कटु रोहिणी के शाक को, या कबूतर के मांस के सरसों के तेल में भूनकर दूध
और शहद के साथ नहीं खाना चाहिये; इन के खाने से रक्ताभिष्यन्द,
शिराजन्य ग्रन्थि-रोग, अपस्मार, शंखकशूल, गलगण्ड, रोहिणी (कण्ठरोहिणी)
रोगों में से कोई एक रोग अथवा मृत्यु प्राप्त होती है। मूली, लहसुन, शोभाञ्जन
की भाजी, अर्जक (कुठेरक), सुमुख (राई) और तुलसी आदि को खाकर
दूध नहीं पीना चाहिये, क्योंकि कुष्ठरोग होने की शंका है। वंशपत्रिका का
शाक या पके हुए ब्यो (बड़हल) को शहद और दूध के साथ नहीं खाना
१ 'हारिद्रक' इति च पाठः।