चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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होने से होता है । रस प्रत्यक्ष है, विपाक सदा परोक्ष और वीर्य अनुमान द्वारा
ज्ञात होता है । यथा-सैन्धव नमक शीत वीर्य और जलचर मांस उष्ण है ।
कहीं २ वीर्य का प्रत्यक्ष द्वारा भी ज्ञान हो जाता है । यथा-राई को चखकर
तीक्ष्ण वीर्य का पता लग जाता है । यह वीर्य सहज और कृत्रिम है, उड़द का
भारीपन और मूंग का हल्कापन यह स्वभाव से ही है । और लाजा का हल्का-
पन यह कृत्रिम है ॥ ६१-६३ ॥
रसवीर्यविपाकानां सामान्यं यत्र लक्ष्यते ।
विशेषः कर्मणां चैव प्रभावस्तस्य स स्मृतः ॥ ६४ ॥
कटुकः कटुकः पाके वीर्योष्णश्चित्रको मतः ।
तद्वद्दन्ती प्रभावात्तु विरेचयति मानवम् ॥ ६५ ॥
विषं विषघ्नमुक्तं यत् प्रभावस्तत्र कारणम् ।
ऊर्ध्वानुलोमिकं यच्च तत्प्रभावप्रभावितम् ॥ ६६ ॥
मणीनां धारणीयानां कर्म यद्विविधात्मकम् ।
तत्प्रभावकृतं तेषां, प्रभावोऽचिन्त्य उच्यते ॥ ६७ ॥
किंचिद्रसेन कुरुते कर्म वीर्येण चापरम् ।
द्रव्यं गुणेन पाकेन प्रभावेण च किंचन ॥ ६८ ॥
रसं विपाकस्तौ वीर्यं प्रभावस्तानपोहति ।
बलसाम्ये रसादीनामिति नैसर्गिकं बलम् ॥ ६९ ॥
सम्यग्विपाकवीर्याणि प्रभावश्चाप्युदाहृतः ।
प्रभाव—जिस स्थान पर रस, वीर्य और विपाक की समानता होने पर
भी कार्य में विशेषता उत्पन्न होती हो, उसे 'प्रभाव' कहते हैं । जिस प्रकार
चित्रक ( चीतामूल ) का रस कटु, विपाक कटु और वीर्य उष्ण है, उसी प्रकार
दन्ती ( जमालमोटा ) भी कटु रस, कटु विपाक और उष्णवीर्य है । परन्तु
जमालमोटा विरेचन करता है, चीता नहीं करता । जो विष विष को ( स्थावर
विष जंगम विष को—'तस्माद् दंष्ट्राविषं मौलम्' ) नष्ट करता है, उसका भी
कारण प्रभाव है । जो द्रव्य ऊर्ध्वगामी और अधोगामी दोनों मार्गों का संशोधन
करता है, वह भी प्रभाव है । मणियों के धारण करने से विषनाश, शूलहरण
आदि जो नाना प्रकार के कार्य होते हैं, वे सब प्रभाव के कारण ही होते हैं।
प्रभाव द्रव्य की वह अचिन्त्य शक्ति है जिसके विषय में कुछ कह नहीं सकते कि
क्यों होता है । कोई द्रव्य अपने रस से, कोई वीर्य से, कोई गुण से, कोई विपाक
से और कोई प्रभाव से कार्य करता है । किसी पदार्थ में रस आदि का बल