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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 321 of 639

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Page 321

अ० २६ ] सूत्रस्थानम् ३०३

वायु और पृथिवी गुण की अधिकता से कषाय रस उत्पन्न होता है । इस प्रकार
से पञ्च महाभूतों के कम अधिक होने से छः रस उत्पन्न होते हैं । जिस प्रकार
सम्पूर्ण स्थावर और जंगम पदार्थों में महाभूतों के कम अधिक होने से नाना
प्रकार के वर्ण, रंग, आकृति, रूप आदि बन जाते हैं, उसी प्रकार छः रस भी
बन जाते हैं। इसी प्रकार महाभूतों के कम अधिक होने से ही काल, संवत्सर
छः ऋतुओं में विभक्त हो जाता है। यथा—हेमन्त काल में सोम गुण की
अधिकता होती है, शिशिर ऋतु में वायु और आकाश गुण की अधिकता होती
है । 'तावेतावर्कवायू' (च० सू० अ० ६) में स्पष्ट कर चुके हैं । बीजाङ्कुरवत्
कार्य कारण की भांति संसार के अनादि होने से, पंच महाभूत और ऋतुओं
का कार्यकारण सम्बन्ध समझना चाहिये ॥३८॥
तत्राग्निमारुतात्मका रसाः प्रायेणोर्ध्वभाजः, लाघवात्पवनत्वाच्च
वायोरूर्ध्वज्वलनत्वाच्च वह्नेः, सलिलपृथिव्यात्मकस्तु प्रायेणाधोभाजः,
पृथिव्या गुरुत्वान्निम्नगत्वाच्चोदकस्य, व्यामिश्रात्मकाः पुनरुभयतो-
भाजः ॥ ३६ ॥
इन में अग्नि और वायु गुण की अधिकता वाले रसयुक्त द्रव्य प्रायः
ऊर्ध्वगामी (वमनकारक) होते हैं। क्योंकि वायु हल्की और उड़ने वाली है।
अग्नि का स्वभाव ऊपर को जलने का है, वह ऊपर को गति करता है,
इसलिए इन गुणों वाले द्रव्य ऊर्ध्वगामी हैं। जल और पृथिवी गुण युक्त रस
वाले द्रव्य प्रायः करके अधोगामी (विरेचनकारक) होते हैं। क्योंकि पृथिवी
गुरु है और पानी का स्वभाव नीचाई की ओर बहना है। जिन पदार्थों
में चारों तत्त्व मिले रहते हैं वे ऊर्ध्वगामी और अधोगामी दोनों तरह के
होते हैं ॥ ३६ ॥
तेषां षण्णां रसानामेकैकस्य यथाद्रव्यं गुणकर्माण्यनुव्याख्यास्यामः। तत्र
मधुरो रसः शरीरसात्म्याद्रस-रुधिर-मांस-मेदोऽस्थि-मज्जौजः-शुक्राभिव-
र्धन आयुष्यः षडिन्द्रियप्रसादनो बलवर्णकरः पित्त-विष-मारुत-घ्नस्तृष्णा-
प्रशमनस्त्वच्यः कण्ठ्यः प्रीणनो जीवनस्तर्पणो बृंहणः स्थैर्यकरः
क्षीणक्षतसंधानकरो घ्राण-मुख-कण्ठौष्ठ-जिह्वा-प्रह्लादनो दाहमूर्च्छाप्रशमनः
षट्पदपिपीलिकानामभीष्टतमः स्निग्धः शीतो गुरुश्च । स एवंगुणोऽप्येक
एवात्यर्थमुपयुज्यमानः स्थौल्यं मार्दवमालस्यमतिस्वप्नं गौरवमनन्ना-
भिलाषमग्निदौर्बल्यमास्यकण्ठमांसाभिवृद्धिं श्वास-कास-प्रतिश्यायालस-
क-शीत-ज्वरानाहास्य-माधुर्य-वमथु-संज्ञास्वरप्रणाश-गलगण्डगण्डमा-