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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 312 of 639

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Page 312

[Header] २६४ चरकसंहिता [अ० २६

विकृति (चावलोँ से बने ताज़ा खील लघु और सत्तू बड़े भारी होते हैं), विचार
(द्रव्यान्तर संयोग यथा—मधु और घी का मेल विष बनता है), देश (दो
प्रकार का है यथा—भूमि और रोगी। भूमि जैसे—श्वेतकपोती वल्मीकाधिरूढ़ा
विषहरी होती है, हिमालय की ओषधियां अधिक गुण युक्त होती हैं, शरीर देश
जैसे टांग के मांस से कन्धे आदि का मांस गुरु होता है) और काल इन के
भेद से बनते हैं। क्षार रस नहीं है। क्योंकि क्षरण किया जाने से, अनेक
पदार्थों से उत्पन्न होने के कारण अनेक रस होने से, कटुक, लवण आदि
रसों का अनुभव होने से, क्षार में स्पर्श और गन्ध होने से यह द्रव्य है, रस
नहीं, और हेत्वन्तर अर्थात् अन्य कारण—भस्म स्राव आदि से बनने के कारण,
रस नहीं है। 'अव्यक्त' भी रस नहीं। क्योंकि अव्यक्तता तो कारण में ही है।
(रसों के कारण जल में ही अव्यक्तता है)। इस के अतिरिक्त अनुरस में
अव्यक्तीभाव होता है। रस के पीछे जो रस होता है, वह अनुरस है। यथा—
रूक्षः कषायानुरसो मधुरः कफपिच्छला। यथा—विष के विषय में ('उष्णमनिर्दें-
श्यरसम्')। अथवा अनुरसयुक्त द्रव्य में अव्यक्तता होती है। और जो यह
कहा है कि रसों के आश्रय आदि भावों के असंख्य होने से रस भी असंख्य हैं,
यह ठीक नहीं। क्योंकि एक-एक रस इन आश्रय रूपी भावों में से किसी
एक भाव का आश्रय करके विशेष रूप से रहता है (यथा—चावल,
मूंग, घृत, दूध आदि वस्तुओं में मधुर रस के आश्रय की भिन्नता रहने
पर भी मधुरत्व रस समान है, जिस प्रकार की बगुला, दूध, और कपास
में आश्रय भेद होने पर भी सफेद रंग समान है)। आश्रय आदि असंख्य
हैं। इसलिये छः से भिन्न अन्य रस का होना सम्भव नहीं। और यदि कहो
कि रसों के परस्पर मिलने से रस असंख्य हो जायेंगे ? यह भी ठीक नहीं,
क्योंकि परस्पर मिलने पर भी इनके गुरु, लघु आदि गुण या मधुर
आदि स्वभाव अथवा आयुष्यवर्द्धक आदि असंख्य भेद हो जाते हैं। यहां पर
भी मधुर आदि के प्रत्येक के गुण और प्रकृतियां जो कहीं हैं वे ही परस्पर
मिलती हैं। इसलिये एक रस के दूसरे रस के साथ मिलने से और दोषों के
दूसरे दोषों से मिलने पर भी रस असंख्य, अगणित नहीं होते। इसीलिये
मिले हुए रसों के कर्मों का बुद्धिमान् उपदेश नहीं करते। और इसी कारण से
परस्पर न मिले हुए छः रसों के लक्षणों को पृथक्-पृथक् कहेंगे ॥ ९ ॥

अग्रे तु तावद् द्रव्यभेदमभिप्रेत्य किंचिदभिधास्यामः। सर्वं द्रव्यं
पाञ्चभौतिकमस्मिन्नर्थे। तच्चेतनावदचेतनं च, तस्य गुणाः शब्दादयो