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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 310 of 639

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Page 310

२६२ चरकसंहिता [ अ० २६

आत्रेयो भद्रकाप्यश्च शाकुन्तेयस्तथैव च ।
पूर्णाक्षश्चैव मौद्गल्यो हिरण्याक्षश्च कौशिकः ॥ ३ ॥
यः कुमारशिरा नाम भरद्वाजः स चानघः ।
श्रीमान् वार्योविदश्चैव राजा मतिमतां वरः ॥ ४ ॥
निमिश्च राजा वैदेहो बडिशश्च महामतिः ।
काङ्कायनश्च बाह्लीको बाह्लीकभिषजां वरः ॥ ५ ॥
एते श्रुतवयोवृद्धा जितात्मानो महर्षयः ।
वने चैत्ररथे रम्ये समीयुर्विजिहीर्षवः ॥ ६ ॥
तेषां तत्रोपविष्टानामित्यर्थवती कथा ।
बभूवार्थविदां सम्यग्रसाहारविनिश्चये ॥ ७ ॥
आत्रेय, भद्रकाप्यीय, शाकुन्तेय, पूर्णाक्ष, मौद्गल्य, हिरण्याक्ष, कौशिक,
भरद्वाज कुमारशिर, विद्वच्छ्रेष्ठ वार्योविद, वैदेहमहाराज निमि, महाराज बडिश,
बाह्लीक देशी भिषजों में श्रेष्ठ बाह्लीक (बलख देशीय), कांकायन ये ज्ञानवृद्ध
वयोवृद्ध और जितेन्द्रिय महर्षि चैत्ररथ नामक सुन्दर वन में बिहार करते थे ।
वहां इन के एक साथ बैठने पर रस द्वारा आहार के निर्णय करने के लिये
आपस में गोष्ठी आरम्भ हुई ॥३-७॥
एक एव रस इत्युवाच भद्रकाप्यो यं पञ्चानामिन्द्रियार्थानामन्य-
तमं जिह्वावैषयिकं भावमाचक्षते कुशलाः, स पुनरुदकानन्य इति । द्वौ
रसाविति शाकुन्तेयो ब्राह्मणश्छेदनीयश्चोपशमनीयश्चेति । त्रयो रसा
इति पूर्णाक्षो मौद्गल्यश्छेदनीयोपशमनीयौ साधारणश्चेति । चत्वारो
रसा इति हिरण्याक्षः कौशिकः स्वादुहितश्च स्वादुरहितश्चास्वादुर्हि-
तश्चेति । पञ्च रसा इति कुमारशिरा भरद्वाजो भौमोदकाग्नेयवायवी-
यान्तरिक्षाः । षडूसा इति निमिर्वैदेहो मधुरारम्ल-लवण-कटुक-तिक्त-कषाय-
क्षाराः । अष्टौ रसा इति बडिशो धामार्गवो मधुरारम्ल-लवण-कटु-तिक्त-क-
षाय-क्षाराव्यक्ताः । अपरिसंख्येया रसा इति काङ्कायनो बाह्लीक-भिष-
क्,आश्रय-गुण-कर्म-संस्वाद-विशेषाणामपरमेयत्वात् ॥ ८ ॥
भद्रकाप्य ऋषि बोले कि—'रस' एक ही है जिसको कि पांचों इन्द्रियों
के विषयों में से एक जिह्वा का ही विषय कहते हैं, वह 'रस' पानी से अभिन्न है
और एक ही है । शाकुन्तेय ब्राह्मण ने कहा कि—'रस' दो हैं, एक छेदनीय और
दूसरा उपशमनीय (अर्थात् अपतर्पण-कारक और बृंहणकारक) । पूर्णाक्ष मोद्गल्य
ऋषि बोले कि—तीन रस हैं । यथा—छेदनीय, उपशमनीय और साधारण अर्थात्
आग्नेय और सौम्य गुणों की समानता से लंघन, बृंहण दोनों कार्य करने वाला । हिर-