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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 306 of 639

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Page 306

२८८ चरकसंहिता [ अ० २५
के लक्षणों में मन की दुश्चिन्ता; शोक, सन्देह मिटानेवालों में वैद्यों का समूह
अर्थात् बहुत वैद्यों का होना; वैद्य के गुणों में देश काल के अनुसार चिकित्सा
करना; ओषधियों में यथार्थ ज्ञान; ज्ञानसाधनों में शास्त्र सहित तर्क; काल ज्ञान
समयानुसार काम करना; व्यवसाय न करना-समय के नाश करने वाले कारणों
में, कर्म का देखना सन्देह को मिटाने वाली वस्तुओं में; भय करनेवाले कार्योंमें
असामर्थ्य; बुद्धि बढ़ाने वाले कारणों में उस विद्या को जानने बालों से बात-
चीत; शास्त्र के तत्त्व को जानने के लिये आचार्य; अमृर्तों में आयुर्वेद, कर्त्तव्य
कार्यों में उत्तम सत्य बचन, सब अहितकारी वस्तुओं में 'असत्य' का सेवन;
सब प्रकार के सुखों में; संन्यास ( सर्वस्व त्याग ) श्रेष्ठ अर्थात् श्रेयस्कर है ॥
भवन्ति चात्र—अग्र्याणां शतमुद्दिष्टं यद् द्विपञ्चाशदुत्तरम् ।
अलमेतद्विकाराणां विघातायोपदिश्यते ॥ ३९ ॥
इस प्रकार से १५२ ( एक सौ बावन ) श्रेष्ठ पदार्थ कहे हैं, ये विकार
अर्थात् रोगों के नाश करने के लिये पर्याप्त हैं ॥ ३६ ॥
समानकारिणो येऽर्थास्तेषां श्रेष्ठस्य लक्षणम् ।
ज्यायस्त्वं कार्यकारित्वेऽवरत्वं चाप्युदाहृतम् ॥ ४० ॥
वातपित्तकफेभ्यश्च यद्यत्प्रशमने हितम् ।
प्राधान्यतश्च निर्दिष्टं यद् व्याधिहरमुत्तमम् ॥ ४१ ॥
एतन्निशाम्य निपुणं चिकित्सां संप्रयोजयेत् ।
एवं कुर्वन् सदा वैद्यो धर्मकामौ समश्नुते ॥ ४२ ॥
पथ्यं पथोऽनपेतं यद्यच्चोक्तं मनसः प्रियम् ।
यच्चाप्रियमपथ्यं च नियतं तन्न लक्षयेत् ॥ ४३ ॥
मात्रा-काल-क्रिया-भूमि-देह-दोष-गुणान्तरम् ।
प्राप्य तत्तद्धि दृश्यन्ते ते ते भावास्तथा तथा ॥ ४४ ॥
तस्मात्स्वभावो निर्दिष्टस्तथा मात्रादिराश्रयः ।
तदपेक्ष्योभयं कर्म प्रयोज्यं सिद्धिमिच्छता ॥ ४५ ॥
जो पदार्थ शरीर के दोषों को समान करते हैं, या समान अवस्था में रहने
देते हैं वे श्रेष्ठ का लक्षण है । इन के कार्य करने की शक्ति से ही श्रेष्ठ और
हीन भेद किये हैं । ( यथा—लोहितशालयः शूकधान्यानां श्रेष्ठतमाः, उदकमा-
श्वासकराणां श्रेष्ठम् ) । इसी प्रकार वात, पित्त, कफ के नाश के लिये जो वस्तु
मुख्य रूप में श्रेष्ठ है और जो रोग को नष्ट करने के लिये उत्तम है, इन को
जानकर चिकित्सा का आरम्भ करना चाहिये । इस प्रकार करने से वैद्य को