चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in contextअ० २५] सूत्रस्थानम् २७९
नहीं प्राप्त होता । जिस प्रकार के गुणों से पुरुष उत्पन्न होता है उसी प्रकार
के अप्रशस्त गुणों से रोग उत्पन्न होते हैं। पांच महाभूतों से पुरुष उत्पन्न होता
और इन्हीं महाभूतों से वात, पित्त, कफ, (रोगों के कारण) बनते हैं ॥२६-२६॥
अथात्रेयस्य भगवतो वचनमनुनिशम्य पुनरेव वामकः काशिपति-
रुवाच भगवन्तमात्रेयं—भगवन् ! संपन्निमित्तजस्य पुरुषस्य विपन्निमि-
त्तानां च रोगाणां किमभिवृद्धिकारणमिति ॥ ३० ॥
आत्रेय ऋषि के वचन सुन कर फिर काशिपति वामक कहने लगे । हे
भगवन् ! प्रशस्त गुणों से उत्पन्न पुरुष की और अप्रशस्त गुणों से उत्पन्न रोगों
की वृद्धि करने वाले कौन से कारण हैं ? ॥३०॥
तमुवाच भगवानात्रेयः—हिताहारोपयोग एक एव पुरुषस्याभिवृ-
द्धिकरो भवति, अहिताहारोपयोगः पुनर्व्याधीनां निमित्तमिति ॥३१॥
वामक ऋषि को भगवान् आत्रेय ने उत्तर दिया । हितकारी वस्तुओं का
आहार रूप में उपयोग करना ही पुरुष की वृद्धि में अकेला कारण है। अहित-
कारी वस्तुओं का सेवन करना ही रोगों की वृद्धि में एकमात्र कारण है ॥३१॥
एवंवादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच—कथमिह भगवन् !
हिताहितानामाहारजातानां लक्षणमनपवादमभिजानीयान्, हितस-
माख्यातानां चैव ह्याहारजातानामहितसमाख्यातानां च मात्राकालक्रि-
याभूमिदेहदोषपुरुषावस्थान्तरेषु विपरीतकारित्वमुपलभामहे ।३२। इति
इस प्रकार कहते हुए आत्रेय ऋषि को अग्निवेश ने पूछा—हे भगवन् !
किस प्रकार से हितकारी या अहितकारी आहार रूप पदार्थों को बिना दोष
(अपवाद) के जान सकते हैं । क्योंकि हितकारी पदार्थ एवं अहितकारी पदार्थ
मात्रा, काल, क्रिया (संस्कार), भूमि, देह, दोष और पुरुष भेद से विपरीत,
विरुद्ध गुण वाले हितकारी पदार्थ अहितकारी, और अहितकारी पदार्थ
हितकारी बन जाते हैं ॥ ३२ ॥
तमुवाच भगवानात्रेयः—यदाहारजातमग्निवेश ! समांश्चैव शरीर-
धातून् प्रकृतौ स्थापयति विषमांश्च समीकरोतीत्येतद्धितं विद्धि, विप-
रीतमहितमिति; एतद्धिताहितलक्षणमनपवादं भवति ॥ ३३ ॥
अग्निवेश को भगवान् आत्रेय ने उत्तर दिया—हे अग्निवेश जो भोजन
(आहार के पदार्थ) शरीर के सम धातुओं को प्रकृति अर्थात् समानावस्था
में रखता है और विषम धातुओं को सम करता है वह हितकारी है । इसके
विपरीत पदार्थ अहितकारी हैं, हित और अहित पदार्थों का यह लक्षण
दोषशून्य है ॥ ३३ ॥