चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
Page 295 of 639
Read in contextअ० २५ ] सूत्रस्थानम् २७७
तथा ब्रुवाणं कौशिकमाह तन्नेति शौनकः ।
कस्मान्मातापितृभ्यां हि बिना षड्धातुजो भवेत् ॥ १६ ॥
पुरुषः पुरुषाद् गौर्गोरश्वादश्वः प्रजायते ।
पैत्र्या मेहादयश्चोक्ता रोगास्तावत्र कारणम् ॥ १७ ॥
इस प्रकार कहते हुए कुशिक (हिरण्याक्ष) को शौनक ने कहा कि—
माता पिता के बिना छः धातु कैसे हो सकते हैं ? पुरुष से, पुरुष गौ से गाय,
और घोड़े से घोड़ा उत्पन्न होता है और माता पिता के प्रमेहादि रोग पुत्र में
आते हैं, इसलिये रोगों और पुरुषों की उत्पत्ति में कारण माता-पिता ही हैं ॥१७॥
भद्रकाप्यस्तु नेत्याह नह्यन्धोऽन्धात्प्रजायते ।
मातापित्रोरपि च ते प्रागुत्पत्तिर्न युज्यते ॥ १८ ॥
कर्मजस्तु मतो जन्तुः कर्मजास्तस्य चाऽऽमयाः ।
नह्यृते कर्मणो जन्म रोगाणां पुरुषस्य च ॥ १९ ॥
भद्रकाप्य ऋषि बोले—यह ठीक नहीं, क्योंकि अन्धे माता-पिता से पुत्र
अन्धा उत्पन्न नहीं होता । मता-पिता की उत्पत्ति से पूर्व पुरुष का और रोग
का होना असम्भव होता है । इसलिये कर्म से ही पुरुष उत्पन्न होता है और
कर्म से ही रोग उत्पन्न होते हैं। कर्म के बिना न तो पुरुष का और न रोगों का
जन्म हो सकता है ॥ १८–१९ ॥
भरद्वाजस्तु नेत्याह कर्ता पूर्वं हि कर्मणः ।
दृष्टं न चाकृतं कर्म यस्य स्यात्पुरुषः फलम् ॥ २० ॥
भावहेतुः स्वभावस्तु व्याधीनां पुरुषस्य च ।
खरद्रवचलोष्णत्वं तेजोन्तानां यथैव हि ॥ २१ ॥
भरद्वाज ऋषि बोले कि—कर्म से पहिले कर्त्ता है। बिना कर्मों के किये
हुए कर्म का फल नहीं देखा जाता । प्रथम कर्म होने से फल होता है, इसलिये
प्रथम कर्म होना चाहिये, जिसके फलस्वरूप पुरुष उत्पन्न होना चाहिये । कर्म
को करने के लिये कर्त्ता ( पुरुष ) आवश्यक है । इसलिये मनुष्य और रोग की
उत्पत्ति में कारण 'स्वभाव' ही है। जिस प्रकार पृथ्बी, अप, वायु और अग्नि
में खरत्व ( खरखरापन ) द्रवत्व ( तरलता ), चलत्व ( गति ) और उष्णत्व
( गरमी ), स्वभाव से ही होता है ॥ २०-२१ ॥
काङ्कायनस्तु नेत्याह नह्यारम्भ फलं भवेत् ।
भवेत्स्वभावाद्भावानांमसिद्धिः सिद्धिरेव वा ॥ २२ ॥