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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 282 of 639

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Page 282

२६४ चरकसंहिता [अ० २३
प्रयोगादस्य शाम्यन्ति रोगाः संतर्पणोत्थिताः ।
प्रमेहा मूढवाताश्च कुष्ठान्यर्शासि कामलाः ॥ २२ ॥
प्लीहा पाण्ड्वामयः शोफो मूत्रकृच्छ्रमरोचकः ।
हृद्रोगो राजयक्ष्मा च कासः श्वासो गलग्रहः ॥ २३ ॥
क्रिमयो ग्रहणीदोषाः श्वैत्र्यं स्थौल्यमतीव च ।
नराणां दीप्यते चाग्निः स्मृतिर्बुद्धिश्च वर्धते ॥ २४ ॥
व्यायामनित्यो जीर्णाशी यव-गोधूम-भोजनः ।
संतर्पणकृतैर्दोषैः स्थौल्यं मुक्त्वा विमुच्यते ॥२५॥
नागरमोथा, अमलतास, पाढ़ल, त्रिफला, देवदारु, गोखरू, खैर की छाल,
नीम की छाल, हल्दी, दारूहल्दी, कूड़े की छाल, इन औषधियों से क्वाथ करके
दोषानुसार प्रतिदिन प्रातःकाल पीने से, सन्तर्पणजन्य सब व्याधियों से मुक्त हो
जाता है। स्नेह साधन द्वारा त्वचा के रोग मिट जाते हैं। कूठ, गोमेदक मणि,
(या अंकोल) हींग, कौंच पक्षी की अस्थि, सोंठ, मिरच, पिप्पली, वच, वासा,
इलायची, गोखरू, अजवायन, पाषाणभेद इन सब को तक्र या दधिमण्ड के
साथ अथवा खट्टे बेरों के रसों के साथ पीने से मूत्रकृच्छ्र और प्रमेह रोग मिटते
हैं। छाछ और हरड़ के प्रयोग से या छाछ और त्रिफला के प्रयोग से, या तक्रा-
रिष्ट के प्रयोग से (प्रमेह में कहे अरिष्टों के उपयोग से) प्रमेह आदि रोग शान्त
होते हैं। सोंठ, मिरच, पिप्पली, त्रिफला मधु, बायविडंग, अजवायन, पानी में
घुला (घिसा) अगर, घी और सत्तू इनका मन्थ बनाकर पीने से प्रमेह आदि रोग
मिटते हैं। सोंठ, मिरच, पीपल, वायबिडंग, शोभाञ्जन, त्रिफला, कुटकी, छोटी
कटेरी, बड़ी कटेरी, हल्दी, दारुहल्दी, पाढ़ल, अतीस, पृश्निपर्णी, हींग, केवूक-
मूल, अजवायन, धनिया, चीतामूल, सुवर्चल, जीरा हाऊबेर, इनका चूर्ण कर
लेना चाहिये। अब चूर्ण के बराबर तेल, घी और शहद प्रत्येक समान भाग
मिलाना चाहिये। इसमें जौ के सत्तू का सोलहवां भाग मिला कर खाना
चाहिये। इस प्रकार करने से सन्तर्पणजन्य रोग शान्त हो जाते हैं। प्रमेह,
मूढ़वात, कुष्ठ, अर्श, कामला, प्लीहा, पाण्डुरोग, शोफ, मूत्रकृच्छ्र, अरुचि,
हृदय रोग, राजयक्ष्मा, कास, श्वास, गले का अवरोध, कृमि, ग्रहणी रोग, श्वित्र
रोग, अतिस्थूलता रोग नष्ट होते हैं, जाठराग्नि दीप्त होती है और स्मृति एवं
बुद्धि बढ़ती है। नित्य व्यायाम करने वाला, पहिले भोजन के जीर्ण होने पर
खाने वाला, जौ और गेहूँ का भोजन करने वाला मनुष्य सन्तर्पणजन्य रोगों से
मुक्त होता है, तथा स्थूलता का नाश होता है ॥ १२-२५ ॥