चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
DevanagariSanskritpublished639 pages
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२६२ चरकसंहिता [ अ० २३
त्रयोविंशतितमोऽध्यायः ।
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अथातः सन्तर्पणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे सन्तर्पणीय अध्याय का व्याख्यान करेंगे, जैसा भगवान्
आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥
संतर्पयति यः स्निग्धैर्मधुरैर्गुरुपिच्छिलैः ।
नवान्नैर्नवमद्यैश्च मांसैश्चानूपवारिजैः ॥ ३ ॥
गोरसैर्गौडिकैश्चान्न्रैः पैष्टिकैश्चातिमात्रशः ।
चेष्टाद्वेषी दिवास्वप्न-शय्यासन-सुखे रतः ॥ ४ ॥
रोगास्तस्योपजायन्ते संतर्पणनिमित्तजाः ।
जो पुरुष स्निग्ध, मधुर, गुरु और पिच्छिल पदार्थों से शरीर का सन्तर्पण
करते हैं, नये अन्न, नवीन मद्य, जलीय प्रदेश में या जलचर प्राणियों के मांस
का सेवन, दूध से बने या गुड़ से बने पदार्थों का या पौष्टिक भोजनों का अति
उपयोग करते हैं, हाथ पांव हिलाने की क्रिया करना पसन्द नहीं करते, दिन में
सोना, आरामतलबी से उठना-बैठना जिन्दगी बसर करना पसन्द करते हैं उनकी
सन्तर्पणजन्य रोग उत्पन्न हो जाते हैं ॥ ३-४ ॥
प्रमेह-कण्डू-पिडकाः कोठ-पाण्ड्वामय-ज्वराः ॥ ५ ॥
कुष्ठान्यामप्रदोषाश्च मूत्रकृच्छ्रमरोचकः ।
तन्द्रा क्लैब्यमतिस्थौल्यमालस्यं गुरुगात्रता ॥ ६ ॥
इन्द्रियस्रोतसां लेपो बुद्धेर्मोहः प्रमीलकः ।
शोफाश्चैवंविधाश्चान्ये शीघ्रमप्रतिकुर्वतः ॥ ७ ॥
सन्तर्पणजन्य रोग-प्रमेह, कण्डू, फुन्सियां, कोठ (बर्रै के काटे के समान
चकत्ते), पाण्डु रोग, ज्वर, कुष्ठ रोग, विषूचिका आदि, मूत्रकृच्छ्र, अरुचि,
तन्द्रा, क्लीबता, अतिस्थूलता, आलस्य, शरीर का भारीपन, इन्द्रिय और स्रोतों
का अवरोध, बुद्धिभ्रंश, निरन्तर एक ही बात की चिन्ता, सूजन एवं इसी प्रकार
के अन्य रोग शीघ्र प्रतिकार न करने से उत्पन्न हो जाते हैं ॥ ५-७ ॥
शस्तमुल्लेखनं तत्र विरेको रक्तमोक्षणम् ।
व्यायामश्चोपवासश्च धूमाश्च स्वेदनानि च ॥ ८ ॥
सक्षौद्रश्चाभयाप्राशः प्रायो रूक्षाश्नसेवनम् ।
चूर्णप्रदेहा ये चोक्ताः कण्डूकोठविनाशनाः ॥ ६ ॥