चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in contextदिन में सोने से इनके विषम धातु सम होते हैं, बल बढ़ता है, कफ अंगों को
पुष्ट करता है और आयु स्थिर होती है * ॥ ३५-४२ ॥
ग्रीष्मे चाऽऽदानरूक्षाणां वर्धमाने च मारुते ।
रात्रीणां चातिसङ्क्षेपाद्दिवास्वप्नः प्रशस्यते ॥ ४३ ॥
ग्रीष्मवर्ज्येषु कालेषु दिवास्वप्नात्प्रकुप्यतः ।
श्लेष्मपित्ते, दिवास्वप्नस्तस्मात्तेषु न शस्यते ॥ ४४ ॥
मेदस्विनः स्नेहहित्याः श्लेष्मलाः श्लेष्मरोगिणः ।
दूषीविषार्ताश्च दिवा न शयीरन् कदाचन ॥ ४५ ॥
हलीमकः शिरः शूलं स्तैमित्यं गुरुगात्रता ।
अङ्गमर्दोऽग्निनाशश्च प्रलेपो हृदयस्य च ॥ ४६ ॥
शोथारोचक-हल्लास-पीनसार्द्धावभेदकाः ।
कोठोऽरुः पिडकाः कण्डूस्तन्द्रा कासो गलामयाः ॥ ४७ ॥
स्मृति-बुद्धि-प्रमोहश्च संरोधः स्रोतसां ज्वरः ।
इन्द्रियाणामसामर्थ्यं विष-वेग-प्रवर्तनम् ॥ ४८ ॥
भवेन्नॄणां दिवास्वप्नस्याहितस्य निषेवणात् ।
तस्माद्धिताहितं स्वप्नं बुद्ध्वा स्वप्यात्सुखं बुधः ॥ ४९ ॥
रात्रौ जागरणं रूक्षं स्निग्धं प्रस्वपनं दिवा ।
अरूक्षमनाभिष्यन्दि त्वासीनप्रचलायितम् ॥ ५० ॥
देहवृत्तौ यथाऽऽहारस्तथा स्वप्नः सुखो मतः ।
स्वप्नाहारसमुत्थे च स्थौल्यकार्यं विशेषतः ॥ ५१ ॥
ग्रीष्म ऋतु आदान काल एवं रूक्ष है, इस समय वायु बढ़ती है, और
रातें बहुत छोटी होती हैं, इसलिये दिन में सोना उत्तम है। ग्रीष्म ऋतु को
छोड़कर और ऋतुओं में सोने से कफ और पित्त विकृत होते हैं, इसलिये इन
समयों में दिन के समय सोना ठीक नहीं है। मेदस्वी, नित्य स्नेह का सेवन करने
वाले, कफप्रकृति, कफरोगी, और दूषी विष से पीड़ित पुरुष दिन में खास कर
कभी भी न सोयें । दिन में सोने से हलीमक, शिरोवेदना, अंगों में भारीपन, अंगों
- नींद का स्थान कहां है ? यह तो कहना कठिन है, परन्तु जब मन या
मन से युक्त आत्मा मस्तिष्क की पंचम जवनिका ( Fifth Ventrical ) में
पहुंच जाती है तब पुरुष को नींद आती है। इस जवनिका के साथ किसी भी
ज्ञानतन्तु का सम्बन्ध नहीं है। इसी से कहा है—"स्वप्नश्च निरिन्द्रियप्रदेशे
मनोऽवस्थानम्” ॥