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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 260 of 639

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Page 260

२४२ चरकसंहिता [ अ० २०

(हल्कापन) विशदता, शीतलता, गति, अमूर्त्तत्व (अदृश्यत्व), ये वायु के स्वरूप हैं।
वायु के कर्मों से पहिचान-शरीर के जिस जिस अवयव में वायु आश्रय लेतो है,
वहां पर संस (खिसकना), भ्रंश (दूर खिसकना), विस्तार, अवसन्नता, हर्ष, प्यास,
मर्दन की पीड़ा, आवर्त्तन, हिलने की चुभने की पीड़ा, चेष्टा आदि कम्पन, कर्कशता,
कठोरता, पृथक्करण, छेद करना, लाल रंग, कषाय रस, मुख की विरसता,
मुख का शुष्क होना, दर्द, शून्यता, संकोच, स्तम्भन, खञ्जत्व ( लंगड़ापन )
आदि वायु के काम हैं। इन लक्षणों वाले को वातरोग ही जानना चाहिये।
इस वायु की मधुर, अम्ल, लवण, स्निग्ध, उष्ण क्रियाओं से चिकित्सा करनी
चाहिये। स्नेहन, स्वेदन, आस्थापन, अनुवासन, नस्य कर्म, भोजन, मर्दन,
उबटन लगाना, परिषेक-स्नान आदि वातनाशक कमों को मात्रा और काल का
विचार करके प्रयोग करना चाहिये। इन सब कर्मों में वैद्य लोग आस्थापन और
अनुवासन (बस्ति) को ही सब से श्रेष्ठ उपाय वायु के लिये मानते हैं। यह
शीघ्रता से पक्वाशय में पहुंचकर सम्पूर्ण रोगों को उत्पन्न करने वाले वायु को
जड़ से नष्ट कर देती है। ऐसी अवस्था में वायु के पूर्ण शान्त न होने पर भी
शरीर के अन्दर के वायुरोग शान्त हो जाते हैं, जैसे--वनस्पतियों के जड़ के
कट जाने पर लता, शाखा, अंकुर, फल, फूल पत्ते आदि का नाश
अवश्यंभावी है ॥ १२-१३ ॥
पित्तविकाराश्चत्वारिंशदत ऊर्ध्वं व्याख्यास्यन्ते; तद्यथा- ओषश्च,
प्लोषश्च, दाहश्च, दवथुश्च, धूमकश्च, अम्लकाश्च, विदाहश्च, अन्तर्दाहश्च,
[ अङ्गदाहश्च ], ऊष्माधिक्यं च, अतिस्वेदश्च, [ अङ्गस्वेदश्च, ] अङ्ग-
गन्धश्च, अङ्गावदरणं च, शोणितक्लेदश्च, मांसक्लेदश्च, त्वग्दाहश्च,
मांसदाहश्च, त्वगवदरणं च, चर्मावदरणं च, रक्तकोठाश्च, (रक्तविस्फो-
टाश्च,) रक्तपित्तं च, रक्तमण्डलानि च, हरितत्वं च, हारिद्रत्वं च,
नीलिका च, कक्षा च, कामला च, तिक्तास्यता च, ( लोहितगन्धास्यता
च,) पूतिमुखता च, तृष्णाया आधिक्यं च, अतृप्तिश्च. आस्यपाकश्च,
गलपाकश्च, अक्षिपाकश्च, गुदपाकश्च, मेढ्रपाकश्च, जीवादानं च, तमः-
प्रवेशश्च, हरित-हारिद्र-मूत्र-नेत्र-वर्चस्त्वं चेति चत्वारिंशत्पित्तविकाराः
पित्तविकाराणामपरिसंख्येयानामाविष्कृततमा व्याख्याता भवन्ति ॥१४॥
इसके आगे पित्तजन्य, विकारों की व्याख्या करते हैं-पित्त विकार-ओष
(पास में रखी अग्नि की आंच ), प्लोष (जलने के समान जलन), दाह
(जलना), दवथु (सब अंगों में जलने के समान धक्-धक् होना), धूमक (धूंयें
जैसा वमन आना), खट्टाश, जलन, शरीर के अन्दर दाह, अंगों में दाह, गरमी