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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 255 of 639

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Page 255

अ० २० ] सूत्रस्थानम् २३७
निज (स्वतःशरीर में उत्पन्न हुए) रोग को आगन्तुज रोग अनुयान करता
है। इसी प्रकार आगन्तुज (अभिघातजन्य) रोग के पीछे (कारण को लेकर),
निज (अर्थात् शारीरिक लक्षणों से लक्षित) रोग भी हो जाता है। जैसे चोट
लगने के पीछे ज्वर हो जाता है इसलिये अनुबन्धन (अप्रधान, मुख्य) और
प्रकृति (मूल कारण को भली प्रकार जानकर चिकित्साकर्म आरम्भ करना
चाहिये ॥ ६-७॥
तत्र श्लोकौ —विंशकाश्चैककाश्चैव त्रिकाश्चोक्तास्त्रयस्त्रयः ।
द्विकाश्चाष्टौ चतुष्काश्च दश द्वादश पञ्चकाः ॥ ८ ॥
चत्वारश्चाष्टका वर्गाः षट्कौ द्वौ सप्तकास्त्रयः ।
अष्टोदरीये रोगाणामध्याये संप्रकाशिताः ॥ ९ ॥
इस 'अष्टोदरीय' नामक अध्याय में बीस प्रकार के तीन, एक प्रकार के
तीन, तीन प्रकार के तीन, दो प्रकार के आठ, चार प्रकार के दस, बारह
प्रकार के पांच, चार प्रकार के आठ छः प्रकार के दो और सात प्रकार के
तीन रोग कहे हैं ॥८-९॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने रोगचतुष्के
अष्टोदरीयो नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
—-•-—
विंशोऽध्यायः ।
━•━
अथातो महारोगाध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके आगे महारोगाध्याय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे- जैसा
भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥२॥
चत्वारो रोगा भवन्ति—आगन्तु-वात-पित्त-श्लेष्म-निमित्ताः । तेषां
चतुर्णामपि रोगाणां रोगत्वमेकविधं, रुक्सामान्यात् । द्विविधा पुनः
प्रकृतिरेषां, आगन्तु-निज-विभागात् । द्विविधं चैषामधिष्ठानं, मनःशरीर-
विशेषात् । विकाराः पुनरेषामपरिसंख्येयाः, प्रकृत्यधिष्ठान-लिङ्गायतन-
विकल्प-विशेषात् , तेषामपरिसंख्येयत्वात् ॥ ३ ॥
मूलानि तु खल्वागन्तोन॑ख-दशन-पतनाभिचाराभिशापभिषङ्ग-
व्यध-बन्ध-पीडनरज्जु-दहन-मन्त्राशनि-भूतोपसर्गादीनि. निजस्य तु मुखं
वात-पित्तश्लेष्मणां वैषम्यम् ॥ ४ ॥