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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 244 of 639

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Page 244

२२६ चरकसंहिता [ अ० १८
यस्य श्लेष्मा प्रकुपितो गलबाह्येऽवतिष्ठते ।
शनैः संजनयेच्छोथं गलगण्डोऽस्य जायते ॥ २३ ॥
यस्य श्लेष्मा प्रकुपितस्तिष्ठत्यन्तर्गले स्थितः ।
आशु संजनयेच्छोथं जायतेऽस्य गलग्रहः ॥ २४ ॥
उपजिह्विका रोग— जब कफ कुपित होकर जिह्वा की जड़ में एकत्र होकर
शोथ उत्पन्न करता है, उसे ‘उपजिह्विका’ कहते हैं। गलशुण्डिका—जब कफ
कुपित होकर काकल गलग्रन्थि का आश्रय लेकर शोथ उत्पन्न करता है, तब
इस रोग को 'गलशुण्डिका' कहते हैं। जब कफ कुपित होकर गले के बाहर
आकर शोथ उत्पन्न करता है, तब इसे 'गलगण्ड' कहते हैं। यह सूजन बहुत
धीरे धीरे होता है। जब कफ कुपित होकर गले के अन्दर रहकर शीघ्र ही सूजन
उत्पन्न करता है, उसे 'गलग्रह' ( गले का रुक जाना, स्वर का बंट
जाना ) कहते हैं ॥२१-२४॥
यस्य पित्तं प्रकुपितं सरक्तं त्वचि सर्पति ।
शोथं सरागं जनयेद्विसर्पस्तस्य जायते ॥ २५ ॥
यस्य पित्तं प्रकुपितं त्वचि रक्तेऽवतिष्ठते ।
शोथं सरागं जनयेत् पिडका तस्य जायते ॥ २६ ॥
यस्य पित्तं प्रकुपितं शोणितं प्राप्य शुष्यति ।
तिलका विप्लवो व्यङ्गो नीलिका चास्य जायते ॥ २७ ॥
यस्य पित्तं प्रकुपितं शङ्खयोरवतिष्ठते ।
श्वयथुः शङ्खको नाम दारुणस्तस्य जायते ॥ २८ ॥
यस्य पित्तं प्रकुपितं कर्णमूलेऽवतिष्ठते ।
ज्वरान्ते दुर्जयोऽन्ताय शोथस्तस्योपजायते ॥ २९ ॥
जब पित्त कुपित होकर रक्त के साथ मिलकर त्वचा में फैलता है, तब
लाल रंग की सूजन उत्पन्न होती है, इस को 'विसर्प' कहते हैं। जब पित्त
कुपित होकर रक्त के साथ त्वचा में स्थिर हो जाता है, तब लाल रंग के
उत्पन्न शोथ को 'पिडका' (फुन्सी) कहते हैं। जब कुपित पित्त रक्त में पहुंच-
कर शुष्क हो जाता है तब नीलिका, तिल, व्यंग, चर्मकील, लसन, झांई आदि
रोग होते हैं। जब कुपित पित्त शंखप्रदेश ( कनपटी ) में आकर रुक जाता
है, तब 'शंखक' नाम का भयानक शोथ उत्पन्न होता है। जब कुपित पित्त
कान की जड़ में आकर रुक जाता है, तब ज्वर के अन्त में भयंकर सूजन
उत्पन्न होती है, यह सूजन मारक होती है ॥२५-२९॥