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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

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Page 242

२३४ चरकसंहिता [अ० १८
है, तपाता है, गरम सा लगता है, पसीना आता है, नरमा जाता है, न तो
स्पर्श और न गरमी को सहन करता है। यह पित्तजन्य शोथ है।
भारी, मधुर, शीत, स्निग्ध भोजनों से, बहुत सोने से, व्यायाम न करने से,
श्लेष्मा कुपित होकर त्वचा, मांस, रक्त पर अधिकार करके शोथ उत्पन्न करता
है। यह शोथ देर में उत्पन्न होता और देर में ही शान्त होता है। इसका रंग
धूसर (धुमैला) या श्वेत, चिकना, स्नेहयुक्त, भारी, स्थिर (न हिलने वाला),
गाढ़ा, बालों का अग्र भाग श्वेत हो जाता है, स्पर्श को और गरमी को सहन
कर लेता है, यह कफशोथ है।
अपने अपने कारणों से दो दोष कुपित होकर दो दोषों के लक्षणों वाले शोथ
को उत्पन्न करते हैं। इस प्रकार से संसर्ग जन्य शोथ ३ प्रकार के हैं।
तीनों दोषों के कारणों के मिलने से उत्पन्न सान्निपातिक शोथ एक प्रकार
का है, इस में तीनों दोषों के लक्षण होते हैं।
इस प्रकार प्रकृति भेद से शोथ दो प्रकार के (निज और आगन्तु),
तीन प्रकार के (वातज, पित्तज, कफज), चार प्रकार के (वातजन्य,
पित्तजन्य, कफजन्य, सन्निपातजन्य), सात प्रकार के (वातज, पित्तज, कफज,
वातपैत्तिक, वातश्लैष्मिक, पित्तश्लैष्मिक और सान्निपातिक) होते हैं।
परन्तु सूजन की दृष्टि से शोथ एक ही प्रकार का है, सूजन का होना सब शोथों
में सामान्य है ॥५-१०॥
भवन्ति चात्र—शूयन्ते यस्य गात्राणि स्वपन्तीव रुजन्ति च ।
पीडितान्युन्नमन्त्याशु वातशोथं तमादिशेत् ॥ ११ ॥
यश्चाप्यरुणवर्णाभः शोथो नक्तं प्रणश्यति ।
स्नेहोष्णमर्दनाभ्यां च प्रणश्येत्स च वातिकः ॥ १२ ॥
यः पिपासाज्वरार्त्तस्य दूयतेऽथ विदह्यते ।
खिद्यते क्लिद्यते गन्धी स पैत्तः श्वयथुः स्मृतः ॥१३॥
यः पीत-नेत्र-वक्त्रत्वक् पूर्वं मध्यात् प्रशूयते ।
तनुत्वक् चातिसारी च पित्तशोथः स उच्यते ॥ १४ ॥
यः शीतळः सक्तगतिः कण्डूमान् पाण्डुरेव च ।
निपीडिता नोन्नमति श्वयथुः स कफात्मकः ॥ १५ ॥
यस्य शस्त्रकुशच्छेदाच्छोणितं न प्रवर्तते ।
कृच्छ्रेण पिच्छलान् स्रवति स चापि कफसंभवः ॥ १६ ॥
निदानाकृतिसंसर्गाच्छ्वयथुः स्याद् द्विदोषजः ।
सर्वाकृतिः सन्निपाताच्छोथो व्यामिश्रहेतुजः ॥ १७॥