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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 236 of 639

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Page 236

२१८ चरकसंहिता [ अ० १७
के कन्धे में दर्द होता है । वृक्कजन्य विद्रधि में पीठ का अकड़ना, कमर का
जकड़ जाना, नाभिजन्म विद्रधि में हिचकी, वंक्षणजन्य विद्रधि में जांघों में
दर्द, बस्तिजन्य विद्रधि में मूत्र में कृच्छ्रता, दुर्गन्धयुक्त मूत्र, और बदबूदार मल
आता है । हृदय, क्लोम, यकृत् , प्लीहा, और कुक्षि की विद्रधियों के
पककर फूटने से स्राव मुख से, और नाभि के नीचे वंक्षण एवं बस्ति की
विद्रधियों के फटने से गुदा के मार्ग से तथा नाभि की विद्रधि के फटने से
मुख और गुदा दोनों मार्गों से स्राव बहता है । इन विद्रधियों में हृदय, नाभि
और बस्ति में उत्पन्न विद्रधि के पकने पर और सन्निपातजन्य विद्रधि मृत्युकारक
होती हैं और शेष विद्रधियां कुशल चिकित्सक से शीघ्र प्रतिकार करने पर शान्त
हो जाती हैं । इसलिये जल्दी ही नवीन विद्रधि को जो कि शस्त्र, सर्प, बिजली
और अग्नि के समान पीड़ादायक है, उसकी स्नेहन, विरेचन द्वारा शीघ्र
चिकित्सा करे । उनकी गुल्मों की भांति सम्पूर्ण चिकित्सा करनी चाहिये ॥
भवन्ति चात्र—विना प्रमेहमप्येता जायन्ते दुष्टमेदसः ।
तावच्चैता न लक्ष्यन्ते यावद्वास्तुपरिग्रहः ॥ १०३ ॥
शराविका कच्छपिका जालिनी चेति दुःसहाः ।
जायन्ते ता ह्यतिबलाः प्रभूत-श्लेष्म-मेदसाम् ॥ १०४ ॥
सर्षपी चालजी चैव विनता विद्रधी च याः ।
साध्याःपित्तोल्बणास्ता हि संभवन्त्यल्पमेदसाम् ॥ १०५ ॥
मर्मस्वंसे गुदे पाण्योः स्तने सन्धिषु पादयोः ।
जायन्ते यस्य पिडकाः स प्रमेही न जीवति ॥ १०६ ॥
तथाऽन्याः पिडकाः सन्ति रक्तरपीतासिताऽरुणाः ।
पाण्डुराः पाण्डुवर्णाश्च भस्माभा मेचकप्रभाः ॥ १०७ ॥
मृद्व्यश्च कठिनाश्चान्याः स्थूलाः सूक्ष्मास्तथाऽपराः ।
मन्दवेगा महावेगाः स्वल्पशूला महारुजाः ॥ १०८ ॥
ता बुद्ध्वा मारुतादीनां यथास्वैर्हेतुलक्षणैः ।
अ्रयादुपचरेच्चाशु प्रागुपद्रवदर्शनात् ॥ १०६ ॥
ये पिड़कायें मेद के दुष्ट होने पर बिना प्रमेह के भी उत्पन्न हो जाती हैं ,
और जब तक कि 'वास्तुपरिग्रह' अर्थात् स्थान को चारों ओर से पकड़ नहीं
लेतीं, तब तक इनका पता नहीं चलता । शराविका, कच्छपिका और जालिनी
ये कठिनाई से सहन की जा सकती हैं । जिन में कफ और मेद अधिक होते हैं,
उन में ये उत्पन्न होती हैं और बहुत बलवान् होती हैं । सर्षपी, अलजी, विनता