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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

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DevanagariSanskritpublished978 pages

Page 896 of 978

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Page 896

८९२ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ८

योरादर्श दृश्यमानयोर्वाससोर्यन्नीलं तन्महार्हमितिच्छायानिमित्तं वास एवोच्यते नच्छाया तद्वदिति विरोचनाभिप्रायः । स्वचित्तगुणदोषवशादेव हि शब्दार्थावधारणं तुल्येऽपि श्रवणे ख्यापितं दाम्यत दत्त दयध्वमिति दकारमात्रश्रवणाच्छ्रुत्यन्तरे । निमित्तान्यपि तदनुगुणान्येव सहकारीणि भवन्ति ।२।बहुमूल्य है'—इस कथनसे छायाका निमित्तभूत वस्त्र ही कहा जाता है, छाया नहीं कही जाती उसी प्रकार [प्रजापतिके] इस कथनसे देह ही विवक्षित है—ऐसा विरोचनका अभिप्राय था । एक अन्य श्रुतिमें (बृह० अ० ५ में) केवल दकारके श्रवणसे तुल्य श्रवण होनेपर भी अपने चित्तके गुण-दोषके कारण ही 'दमन करो, दान करो, दया करो' ऐसा विभिन्न शब्दार्थ-ज्ञान देखा गया है । अपने-अपने गुणोंके अनुसार ही युक्तिरूप निमित्त भी सहकारी हो जाते हैं ॥ २ ॥

एवमेवैष मघवन्निति होवाचैतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि वसापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाणीति स हापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाण्युवास तस्मै होवाच ॥३॥

'हे इन्द्र ! यह बात ऐसी ही है' ऐसा प्रजापतिने कहा, 'मैं तुम्हारे प्रति इसकी पुनः व्याख्या करूँगा। अब तुम बत्तीस वर्ष यहाँ और रहो।' इन्द्रने वहाँ बत्तीस वर्ष और निवास किया। तब प्रजापतिने उससे कहा ॥ ३ ॥

एवमेवैष मघवन्सम्‍यक् त्वयावगतं नच्छायात्मेत्युवाच प्रजापतिर्यो मयोक्त आत्मा प्रकृत'हे इन्द्र ! यह बात ऐसी ही है तुमने ठीक समझा है, छाया आत्मा नहीं है—ऐसा प्रजापतिने कहा, 'मैंने तुम्हारे प्रति जिस प्रकृत