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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

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DevanagariSanskritpublished978 pages

Page 891 of 978

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Page 891

नवम खण्ड

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इन्द्रका पुनः प्रजापतिके पास आना

अथ हेन्द्रोऽप्राप्यैव देवानेतद्भयं ददर्श यथैव खल्वयमस्मिञ्शरीरे साध्वलङ्कृते साध्वलङ्कृतो भवति सुवसने सुवसनः परिष्कृते परिष्कृत एवमेवा-यमस्मिन्नन्धेऽन्धो भवति स्रामे स्रामः परिवृक्णे परि-वृक्णोऽस्यैव शरीरस्य नाशमन्वेष नश्यति ॥ १ ॥

किंतु इन्द्रको देवताओंके पास बिना पहुँचे ही यह भय दिखायी दिया। जिस प्रकार इस शरीरके अच्छी प्रकार अलंकृत होनेपर यह (छायात्मा) अच्छी तरह अलंकृत होता है, सुन्दर वस्त्रधारी होनेपर सुन्दर वस्त्रधारी होता है और परिष्कृत होनेपर परिष्कृत होता है उसी प्रकार इसके अंधे होनेपर अंधा हो जाता है, स्राम होनेपर स्राम हो जाता है और खण्डित होनेपर खण्डित हो जाता है तथा इस शरीरका नाश होनेपर यह भी नष्ट हो जाता है ॥ १ ॥

अथ ह किलेन्द्रोऽप्राप्यैव देवान् दैव्याक्रौर्यादिसम्पदा युक्तत्वाद्गुरोर्वचनं पुनः पुनः स्मरन्नेव गच्छन्नेतद्वक्ष्यमाणं भयं स्वात्मग्रहणनिमित्तं ददर्श दृष्टवान् । उदशरावदृष्टान्तेनकिंतु इन्द्रने देवताओंके पास बिना पहुँचे ही, क्योंकि वे अक्रूरता आदि दैवीसम्पत्तिसे युक्त थे इसलिये गुरुवाक्योंको बारंबार स्मरण करते हुए जाते-जाते अपने किये हुए आत्मस्वरूपके ग्रहणके कारण यह भय देखा। जलपात्रके दृष्टान्तसे प्रजापतिने जिसके लिये [अर्थात् देहका अनात्मत्व प्रदर्शित