छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
Page 888 of 978
Read in context| ८८४ | छाान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| तदप्यनयोः श्रवणगोचरत्वमेष्यतीति मत्वोवाच प्रजापतिः । अनुपलभ्य यथोक्तलक्षणमात्मानमननुविद्य स्वात्मप्रत्यक्षं चाकृत्वा विपरीतनिश्चयौ च भूत्वेन्द्रविरोचनावेतौ व्रजतो गच्छेयाताम् । अतो यतरे देवा वासुरा वा किं विशेषितेनैतदुपनिषद आभ्यां या गृहीतात्मविद्या सेयमुपनिषद्येषां देवानामुसुराणां वा त एतदुपनिषद एवंविज्ञाना एतन्निश्चया भविष्यन्तीत्यर्थः । ते किं पराभविष्यन्ति श्रेयोमार्गात्पराभूता बहिर्भूता विनष्टा भविष्यन्तीत्यर्थः । | वाक्यके समान यह वचन भी उनके कानोंमें पड़ जायगा; कहा— 'ये इन्द्र और विरोचन उपर्युक्त लक्षणवाले आत्माको बिना जाने—उसे अपने प्रत्यक्ष किये बिना विपरीत निश्चयवाले होकर जा रहे हैं। इसलिये विशेषरूपसे क्या कहा जाय, जो भी देवता या असुर इस उपनिषद्वाले होंगे—इनके द्वारा जो आत्मविद्या ग्रहण की गयी है वही जिन देवता या असुरोंकी उपनिषद् होगी वे ऐसे उपनिषद्—ऐसे विज्ञान अर्थात् ऐसे निश्चयवाले जो भी होंगे। उनका क्या होगा ? उनका पराभव होगा। तात्पर्य यह है कि वे श्रेयोमार्गसे पराभूत—बहिर्भूत अर्थात् विनष्ट हो जायेंगे।' |
| स्वगृहं गच्छतोः सुरासुरराजयोर्योऽसुरराजः स ह शान्तहृदय एव संन्विरोचनोऽसुराञ्जगाम । गत्वा च तेभ्योऽसुरेभ्यः शरीरात्मबुद्धिर्योपनिषत्तामेतामुपनिषदं प्रोवाचोक्तवान् । देहमात्रमेवात्मा पित्रोक्त इति । | अपने घरको जानेवाले देवराज और असुरराजोंमें जो असुरराज था वह विरोचन शान्तचित्तसे ही असुरोंके पास पहुँचा। तथा वहाँ पहुँचकर उन असुरोंके प्रति जो देहात्मबुद्धिरूप उपनिषद् थी वही उपनिषद् सुना दी। अर्थात् यह कह दिया कि प्रजापतिने देहको ही आत्मा बतलाया है। इसलिये |