छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
Page 886 of 978
Read in context८८२ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ८
| अतः स्वदोषेण केनचित्प्रतिबद्धविवेकविज्ञानसामर्थ्याविति मत्वा यथाभिप्रेतमेवात्मानं मनसि निधायैष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति प्रजापतिः पूर्ववत्। न तु तदभिप्रेतमात्मानम्। | मानकर कि इन दोनोंकी विवेक-विज्ञानसामर्थ्य अपने किसी दोषके कारण प्रतिबद्ध हो गयी है प्रजापतिने उनके माने हुए आत्माका नहीं बल्कि अपने मन्में यथाभिमत आत्माका ही निश्चय कर पहलेहीकी तरह कहा—'यह आत्मा है, यह अमृत और अभय है तथा यही ब्रह्म है।' |
| य आत्मेत्याद्यात्मलक्षणश्रवणेनाक्षिपुरुषश्रुत्या चोदशरावाद्युपपत्त्या च संस्कृतौ तावत्। मद्वचनं सर्वं पुनः पुनः स्मरन्तोः प्रतिबन्धक्षयाच्च स्वयमेवात्मविषये विवेको भविष्यतीति मन्वानः पुनर्ब्रह्मचर्यादेशे च तयोश्चित्तदुःखोत्पत्तिं परिजिहीर्षन्कृतार्थबुद्धितया गच्छन्तावप्युपेक्षितवान्प्रजापतिः। तौ हेन्द्रविरोचनौ शान्तहृदयौ तुष्टहृदयौ कृतार्थबुद्धी इत्यर्थः। न तु शम एव शमश्चेत्तयोर्जातो विपरीतग्रहो विगतोऽभविष्यत्प्रवव्रजतुर्गतवन्तौ ॥ ३ ॥ | 'य आत्मापहतपाप्मा' इत्यादि आत्माका लक्षण सुननेसे, अक्षिपुरुषसम्बन्धिनी श्रुतिसे और उदशरावादिकी युक्तिसे तो ये संस्कारयुक्त हो ही गये हैं; अब मेरी सारी बातको बारंबार स्मरण करते हुए प्रतिबन्धका क्षय होनेपर इन्हें स्वयं ही आत्माके सम्बन्धमें विवेक हो जायगा—ऐसा मानकर और पुनः ब्रह्मचर्यका आदेश देनेपर उन्हें जो दुःख होगा उसे बचानेके लिये प्रजापतिने कृतार्थबुद्धि होकर जाते हुए उन दोनोंकी उपेक्षा कर दी। वे इन्द्र और विरोचन शान्तचित्त-संतुष्टहृदय अर्थात् कृतार्थबुद्धि होकर चले गये। किंतु यह शम नहीं था, क्योंकि यदि उन्हें वास्तविक शम ही होता तो उनका विपरीतग्रहण निवृत्त हो जाता ॥३॥ |