छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished978 pages
Page 87 of 978
Read in contextPage 87
पञ्चम खण्ड
ओंकार, उद्गीथ और आदित्यका अभेद
| प्राणादित्यदृष्टिविशिष्टस्योद्गीथ-<br>स्योपासनमुक्तमेवानूद्य प्रणवोद्गी-<br>थयोरेकत्वं कृत्वा तस्मिन्प्राण-<br>रश्मिभेदगुणविशिष्टदृष्ट्याक्ष-<br>रस्योपासनमनेकपुत्रफलमिदानीं<br>वक्तव्यमित्यारभ्यते— | पूर्वोक्त प्राण और आदित्यदृष्टिसे विशिष्ट उद्गीथोपासनाका ही अनुवाद (पुनरुल्लेख) कर प्रणव और उद्गीथकी एकता करते हुए अब उसी प्रसङ्गमें प्राण और रश्मियोंके भेदरूप गुणसे युक्त दृष्टिसे उस अक्षरकी (उद्गीथावयवभूत ओंकारकी) अनेक पुत्ररूप फलवाली उपासनाका निरूपण करना है—इसीलिये [आगेका ग्रन्थ] आरम्भ किया जाता है— |
|---|
अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथ इत्यसौ वा आदित्य उद्गीथ एष प्रणव ओमिति ह्येष स्वरन्नेति ॥ १ ॥
निश्चय ही जो उद्गीथ है वही प्रणव है और जो प्रणव है वही उद्गीथ है। इस प्रकार यह आदित्य ही उद्गीथ है, यही प्रणव है; क्योंकि यह (आदित्य) 'ॐ' ऐसा उच्चारण करता हुआ ही गमन करता है ॥ १ ॥
| अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो बह्वृचानाम्, यश्च प्रणव- | निश्चय ही जो उद्गीथ है वही ऋग्वेदियोंका प्रणव है तथा उनका |
|---|