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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

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DevanagariSanskritpublished978 pages

Page 857 of 978

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Page 857

खण्ड ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५३


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
स्वप्नबोधापेक्षं च जाग्रद्द्दष्टविषयानृतत्वं न स्वतः। विशेषाकारमात्रं तु सर्वेषां मिथ्याप्रत्ययनिमित्तमिति वाचारम्भणं विकारो नामधेयमनृतं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम्। तान्यप्याकारविशेषतोऽनृतं स्वतः सन्मात्ररूपतया सत्यम्। प्राक्सदात्मप्रतिबोधात् स्वविषयेऽपि सर्वं सत्यमेव स्वप्नदृश्या इवेति न कश्चिद्विरोधः। तस्मान्मानसा एव ब्राह्मलौकिका अरण्यादयः संकल्पजाश्च पित्रादयः कामाः।<br><br>बाह्यविषयभोगवदशुद्धिरहितत्वाच्छुद्धसत्त्वसंकल्पजन्या इति निरतिशयसुखाः सत्याश्चेश्वराणां भवन्तीत्यर्थः। सन्सत्यात्मप्रतिबोधेऽपि रज्ज्वामिव कल्पिताः सर्पादयः सदात्मस्वरूपतामेव प्रतिपद्यन्त इति सदात्मना सत्या एव भवन्ति ॥ ४ ॥इसी प्रकार स्वप्नज्ञानकी अपेक्षा जाग्रत्कालमें देखे हुए विषयोंका मिथ्यात्व है, स्वतः नहीं। सम्पूर्ण पदार्थोंका जो विशेष आकारमात्र है वही मिथ्याज्ञानका कारण है, क्योंकि वाणीपर अवलम्बित विकार नाममात्र और मिथ्या है, बस तीन रूप ही सत्य हैं। वे तीन रूप भी आकारविशेष होनेसे स्वतः तो मिथ्या ही हैं, किंतु सन्मात्ररूप होनेसे सत्य हैं। सदात्माका साक्षात्कार होनेसे पूर्व तो स्वप्नदृश्य पदार्थोंके समान अपने क्षेत्रमें भी वे सब सत्य ही हैं, इसलिये किसी प्रकारका विरोध सम्भव नहीं है। अतः ब्रह्मलोकसम्बन्धी अरण्यादि और संकल्पजनित पित्रादि काम मानसिक ही हैं।<br><br>बाह्य विषयभोगोंके समान अशुद्धिरहित होनेके कारण वे शुद्धान्तःकरणके संकल्पसे होनेवाले हैं; इसलिये ईश्वरके संकल्प आत्यन्तिक सुखमय और सत्य होते हैं—ऐसा इसका तात्पर्य है। सत् ही वास्तविक आत्मा है—ऐसा बोध होनेपर भी वे रज्जुमें कल्पित सर्पादिके समान सदात्मरूपताको ही प्राप्त हो जाते हैं। इसलिये सत्स्वरूपसे वे सत्य ही रहते हैं ॥ ४ ॥

इतिच्छान्दोग्योपनिषद्यष्टमाध्याये पञ्चमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ५ ॥