छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
Page 852 of 978
Read in context| ४५८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| स्तूयते महार्ह एवमिष्टादिभिः शब्दैर्न स्त्र्यादिविषयतृष्णानिवृत्तिमात्रं स्तुत्यर्हं किं तर्हि ज्ञानस्य मोक्षसाधनत्वात्तदेवेष्टादिभिः स्तूयत इति केचित् । न । स्त्र्यादिबाह्यविषयतृष्णापहृतचित्तानां प्रत्यगात्मविवेकविज्ञानानुपपत्तेः । "पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भूस्तस्मात्पराङ् पश्यति नान्तरात्मन्" ( क० उ० २ । १ । १ ) इत्यादिश्रुतिस्मृतिशतेभ्यः । ज्ञानसहकारिकारणं स्त्र्यादिविषयतृष्णानिवृत्तिसाधनं विधातव्यमेवेति युक्तैव तत्स्तुतिः । <br><br> ननु च यज्ञादिभिः स्तुतं ब्रह्मचर्यमिति यज्ञादीनां पुरुषार्थ- | तुम यम हो, तुम वरुण हो' इत्यादि वाक्योंसे किसी परम पूजनीय पुरुषकी स्तुति की जाती है उसी प्रकार इष्टादि शब्दोंसे केवल स्त्री आदि विषयसम्बन्धिनी तृष्णाकी निवृत्ति ही स्तुति योग्य नहीं है, तो फिर क्या है ? [इसपर वे कहते हैं—] ज्ञान मोक्षका साधन है, अतः इष्टादि शब्दोंसे उसीकी स्तुति की जाती है। परंतु यह मत ठीक नहीं है, क्योंकि स्त्री आदि बाह्य विषयोंकी तृष्णाद्वारा जिनका चित्त हर लिया गया है उन्हें प्रत्यगात्म-विषयक विवेकज्ञान होना सम्भव नहीं है। यह बात "स्वयम्भू ब्रह्माने इन्द्रियोंको बहिर्मुख करके हिंसित कर दिया है; इसलिये जीव बाह्य विषयोंको देखता है, अन्तरात्माको नहीं देखता" इत्यादि सैकड़ों श्रुति-स्मृतियोंसे सिद्ध होती है। अतः ज्ञानके सहकारी कारण स्त्री आदि विषयसम्बन्धी तृष्णाकी निवृत्तिरूप साधनका विधान करना ही चाहिये—इसलिये उसकी स्तुति करना भी उचित ही है। <br><br> शिष्य—किंतु ब्रह्मचर्यकी यज्ञादिरूपसे स्तुति की गयी है; इससे यज्ञादिका पुरुषार्थसाधनत्व |