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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

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DevanagariSanskritpublished978 pages

Page 849 of 978

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Page 849

खण्ड ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८४५


तथा जिसे अनाशकायन (नष्ट न होना) कहा जाता है वह भी ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि जिसे [साधक] ब्रह्मचर्यके द्वारा प्राप्त होता है वह यह आत्मा नष्ट नहीं होता। और जिसे अरणयायन ऐसा कहा जाता है वह भी ब्रह्मचर्य ही है; क्योंकि इस ब्रह्मलोकमें 'अर' और 'ण्य' ये दो समुद्र हैं, यहाँसे तीसरे द्युलोकमें ऐरंमदीय सरोवर है, सोमसवन नामका अश्वत्थ है, वहाँ ब्रह्माकी अपराजिता पुरी है और प्रभुका विशेषरूपसे निर्माण किया हुआ सुवर्णमय मण्डप है ॥ ३ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
अथ यदनाशकायनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तत्। यमात्मानं ब्रह्मचर्येणानुविन्दते स एष ह्यात्मा ब्रह्मचर्यसाधनवतो न नश्यति तस्मादनाशकायनमपि ब्रह्मचर्यमेव।तथा जिसे 'अनाशकायन' ऐसा कहते हैं वह भी ब्रह्मचर्य ही है। जिस आत्माको ब्रह्मचर्यके द्वारा प्राप्त करता है, ब्रह्मचर्यरूप साधनवाले पुरुषका वह आत्मा नष्ट नहीं होता; अतः अनाशकायन भी ब्रह्मचर्य ही है।
अथ यदरणयायनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तत्। अरण्यशब्दयोरर्णवयोर्ब्रह्मचर्यवतोऽयनादरणयायनं ब्रह्मचर्यम्। यो ज्ञानाद्यज्ञ एषणादिष्टं सतस्त्राणात्सत्रायणं मननान्मौनमनशनादनाशकायनमरण्योर्गमनादरणयाय-और जिसे 'अरणयायन' (वनवास) ऐसा कहते हैं वह भी ब्रह्मचर्य ही है। ब्रह्मचर्यवान् पुरुष 'अर' और 'ण्य' नामवाले दो समुद्रोंके प्रति गमन करता है, इसलिये ब्रह्मचर्य अरणयायन है। जो ब्रह्मचर्य ज्ञानरूप होनेके कारण यज्ञ है, एषणाके कारण इष्ट है, सत् (ब्रह्म) से रक्षा करानेके कारण सत्रायण है, मनन करनेके कारण मौन है, नष्ट न होनेके कारण अनाशकायन है और अर एवं ण्य इन