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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished978 pages

Page 83 of 978

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Page 83

खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७९


तानु तत्र मृत्युर्यथा मत्स्यमुदके परिपश्येदेवं पर्यपश्यदृचि साम्नि यजुषि । ते नु विदित्वोर्ध्वा ऋचः साम्नो यजुषः स्वरमेव प्राविशन् ॥ ३ ॥

जिस प्रकार [मछेरा] जलमें मछलियोंको देख लेता है, उसी प्रकार ऋक्, साम और यजुःसम्बन्धी कर्मोंमें लगे हुए उन देवताओंको मृत्युने देख लिया । इस बातको जान लेनेपर उन देवताओंने ऋक्, साम और यजुः सम्बन्धी कर्मोंसे निवृत्त होकर स्वर (ॐ इस अक्षर) में ही प्रवेश किया॥ ३॥


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
तांस्तत्र देवान्कर्मपरान्मृत्युर्यथा लोके मत्स्यघातको मत्स्यमुदके नातिगम्भीरे परिपश्येद्दण्डिशोदकस्रावोपायसाध्यं मन्यमानः, एवं पर्यपश्यद्दृष्टवान्मृत्युः; कर्मक्षयोपायेन साध्यान्देवान्मेन इत्यर्थः। क्वासौ देवान्ददर्श? इत्युच्यते—ऋचि साम्नि यजुषि । ऋग्यजुःसामसम्बन्धिकर्मणीत्यर्थः । ते नु देवा वैदिकेन कर्मणा संस्कृताः शुद्धात्मानः सन्तो मृत्योश्चिकीर्षितं विदितवन्तः । विदित्वा च त ऊर्ध्वा व्यावृत्ताः कर्मभ्य ऋचः साम्नोजिस प्रकार लोकमें बंसी लगाने और जल उलीचने आदि उपायोंसे मछलियोंको पकड़ा जा सकता है, यह जाननेवाला मछेरा उन्हें कम गहरे जलमें देख लेता है उसी प्रकार मृत्युने कर्मपरायण देवताओंको वहाँ [छिपे हुए] देख लिया, अर्थात् मृत्युने यह समझ लिया कि देवताओंको कर्मक्षयरूप उपायके द्वारा अपने अधीन किया जा सकता है । उसने देवताओंको कहाँ देखा ? यह बतलाया जाता है—ऋक्, साम और यजुमें अर्थात् ऋक्, यजुः और सामसम्बन्धी कर्ममें। वैदिक कर्मानुष्ठानके कारण शुद्धचित्त हुए उन देवताओंने 'मृत्यु क्या करना चाहता है ?' यह जान लिया। यह जानकर वे ऋक्, साम और यजुःसे अर्थात् ऋक्, यजुः और सामसम्बन्धी कर्मसे निवृत्त