छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
Page 827 of 978
Read in contextखण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८२३
और यदि वह भगिनीलोककी कामनावाला होता है तो उसके संकल्पसे ही बहिनें वहाँ उपस्थित हो जाती हैं। उस भगिनीलोकसे सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त होता है ॥ ४ ॥
अथ यदि सखिलोककामो भवति संकल्पादेवास्य सखायः समुत्तिष्ठन्ति तेन सखिलोकेन सम्पन्नोमहीयते। ५।
और यदि वह सखाओंके लोककी कामनावाला होता है तो उसके संकल्पसे ही सखालोग वहाँ उपस्थित हो जाते हैं। उस सखाओंके लोकसे सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त होता है ॥ ५ ॥
अथ यदि गन्धमाल्यलोककामो भवति संकल्पा-
देवास्य गन्धमाल्ये समुत्तिष्ठतस्तेन गन्धमाल्यलोकेन
सम्पन्नो महीयते ॥ ६ ॥
और यदि वह गन्धमाल्यलोककी कामनावाला होता है तो उसके संकल्पसे ही गन्धमाल्यादि वहाँ उपस्थित हो जाते हैं। उस गन्धमाल्य-लोकसे सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त होता है ॥ ६ ॥
अथ यद्यन्नपानलोककामो भवति संकल्पादेवास्यान्न-
पाने समुत्तिष्ठतस्तेनान्नपानलोकेन सम्पन्नो महीयते ।७।
और यदि वह अन्नपानसम्बन्धी लोककी कामनावाला होता है तो उसके संकल्पसे ही अन्नपान उसके पास उपस्थित हो जाते हैं। उस अन्नपान-लोकसे सम्पन्न हो वह महिमाको प्राप्त होता है ॥ ७ ॥
अथ यदि गीतवादित्रलोककामो भवति संकल्पा-
देवास्य गीतवादित्रे समुत्तिष्ठतस्तेन गीतवादित्रलोकेन
सम्पन्नो महीयते ॥ ८ ॥