छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished978 pages
Page 824 of 978
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| ८२० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| एषामिति विषयं दर्शयति तद्य इत्यादिना। | इन (अनात्मवेत्ताओं) को ही प्राप्त होता है—इस प्रकार श्रुति 'तद्ये' इत्यादि वाक्यसे दोषका विषय दिखलाती है। |
| तत्तत्रेहास्मिँल्लोके ज्ञानकर्मणोरधिकृता योग्याः सन्त आत्मानं यथोक्तलक्षणं शास्त्राचार्योपदिष्टमननुविद्य यथोपदेशमनु स्वसंवेद्यतामकृत्वा व्रजन्ति देहादस्मात्प्रयन्ति। य एतांश्च यथोक्तान्सत्यान्सत्यसंकल्पकार्यांश्च स्वात्मस्थान् कामानननुविद्य व्रजन्ति तेषां सर्वेषु लोकेष्वकामचारोऽस्वतन्त्रता भवति। यथा राजानुशासनाननुवर्तिनीनां प्रजानामित्यर्थः। | सो इस लोकमें ज्ञान और कर्मके अधिकारी अर्थात् योग्यतासम्पन्न होकर जो लोग शास्त्र और आचार्यद्वारा उपदेश किये हुए उपर्युक्त लक्षणवाले आत्माको उनके उपदेशके अनुसार बिना जाने—स्वात्मसंवेद्यताको बिना प्राप्त किये इस देहसे चले जाते हैं और जो इन उपर्युक्त सत्य—सत्यसंकल्पकी कार्यभूत अपने अन्तःकरणमें स्थित सत्य कामनाओंको बिना जाने चले जाते हैं उनकी सम्पूर्ण लोकोंमें अकामगति—अस्वतन्त्रता होती है। जिस प्रकार कि राजाकी आज्ञाका अनुवर्तन करनेवाली प्रजाओंकी परतन्त्रता रहती है। |
| अथ येऽन्य इह लोक आत्मानं शास्त्राचार्योपदेशमनुविद्य स्वात्मसंवेद्यतामापाद्य व्रजन्ति यथोक्तांश्च सत्यान्कामांस्तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति राज्ञ इव सार्वभौमस्येह लोके ॥ ६ ॥ | और जो दूसरे लोग इस लोकमें शास्त्र और आचार्यके उपदेशके अनुसार आत्माको जानकर—स्वात्मसंवेद्यताको प्राप्त करके और उपर्युक्त सत्य कामनाओंको जानकर परलोकमें जाते हैं उनकी इस लोकमें सार्वभौम राजाके समान सम्पूर्ण लोकोंमें यथेच्छगति होती है ॥६॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषच्छङ्करभाष्ये
प्रथमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १ ॥
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