छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished978 pages
Page 821 of 978
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खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१७
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| जरादि-प्रतिषेध-सामर्थ्यम्<br>सत्यमेवं तथापि धर्मकार्यानन्दव्यतिरेकेण स्वाभाविकानन्दो यथेश्वरे “विज्ञानमानन्दं ब्रह्म” (बृ० उ० ३ । ९ । २८) इति श्रुतेः । तथाधर्मकार्यजरादिव्यतिरेकेणापि जरादिदुःखस्वरूपं स्वाभाविकं स्यादित्याशङ्क्यते । अतो युक्तस्तन्निवृत्तये जरादीनां धर्माधर्माभ्यां पृथक्प्रतिषेधः । जरादिग्रहणं सर्वदुःखोपलक्षणार्थम् । पापनिमित्तानां तु दुःखानामानन्त्यात्प्रत्येकं च तत्प्रतिषेधस्याशक्यत्वात्सर्वदुःखप्रतिषेधार्थं युक्तमेवापहतपाप्मत्ववचनम् । | समाधान—ठीक है, ऐसा ही होता है; किंतु जिस प्रकार ईश्वरमें धर्मके कार्यभूत आनन्दसे भिन्न “ब्रह्म विज्ञानस्वरूप और आनन्दमय है” इस श्रुतिके अनुसार स्वाभाविक आनन्द है इसी प्रकार अधर्मके कार्यरूप जरादिसे भिन्न स्वाभाविक जरादि दुःखका होना भी सम्भव है—ऐसी आशङ्का हो सकती है । इसलिये उसकी निवृत्तिके लिये धर्माधर्मसे जरादिका पृथक् प्रतिषेध करना उचित ही है । जरादिका ग्रहण सम्पूर्ण दुःखोंके उपलक्षणके लिये है । पापनिमित्तक दुःखोंकी अनन्तता होनेके कारण और उनमेंसे प्रत्येकका प्रतिषेध करना असम्भव होनेसे सम्पूर्ण दुःखोंका प्रतिषेध करनेके लिये उसके अपहतपाप्मत्वका प्रतिपादन करना उचित ही है । |
| सत्या अवितथाः कामा यस्य सोऽयं सत्यकामः । वितथा हि संसारिणां कामाः । ईश्वरस्य तद्विपरीताः । तथा कामहेतवः संकल्पा अपि सत्या यस्य स सत्यसंकल्पः । संकल्पाः कामाश्च शुद्धसत्त्वोपाधिनिमित्ता ईश्वरस्य | जिसकी कामनाएँ सत्य—अमिथ्या हैं उसे सत्यकाम कहते हैं । असत्य तो संसारियोंकी ही कामनाएँ हुआ करती हैं, ईश्वरकी कामनाएँ तो उससे विपरीत होती हैं । इसी प्रकार जिसके कामके हेतुभूत संकल्प भी सत्य हैं वह ईश्वर सत्यसंकल्प है । ईश्वरके |