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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished978 pages

Page 819 of 978

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Page 819

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१५


| पुरं ब्रह्मोपलक्षणार्थत्वात्। तच्चानृतमेव, “वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्” (छा० उ० ६।१।४) इति श्रुतेः। तद्विकारेऽनृतेऽपि देहशृङ्गे ब्रह्मोपलक्ष्यत इति ब्रह्मपुरमित्युक्तं व्यावहारिकम्। सत्यं तु ब्रह्मपुरमेतदेव ब्रह्म; सर्वव्यवहारास्पदत्वात्। अतोऽस्मिन्पुण्डरीकोपलक्षिते ब्रह्मपुरे सर्वे कामा ये बहिर्भवद्भिः प्रार्थ्यन्ते तेऽस्मिन्नेव स्वात्मनि समाहिताः। अतस्तत्प्राप्त्युपायमेवानुतिष्ठत बाह्यविषयतृष्णां त्यजतेत्यभिप्रायः। | शरीरसंज्ञक ब्रह्मपुर ब्रह्मके उपलक्षणके लिये होनेके कारण [ ब्रह्मपुर कहा जाता ] है। और वह तो मिथ्या ही है, क्योंकि “वाणीके आश्रित विकार नाममात्र है” ऐसी श्रुति है। ब्रह्मका विकार और मिथ्या होनेपर भी इस देहरूप अङ्कुर—कार्यमें ब्रह्मकी उपलब्धि होती है, इसलिये इसे व्यावहारिक ब्रह्मपुर कहा गया है। वास्तविक ब्रह्मपुर तो यह ब्रह्म ही है, क्योंकि यह सम्पूर्ण व्यवहारका आश्रय है। अतः इस हृदयपुण्डरीकोपलक्षित ब्रह्मपुरमें सम्पूर्ण कामनाएँ जिन्हें कि आप बाहर पाना चाहते हैं। वे सब-की-सब इस अपने आत्मामें ही स्थित हैं। इसलिये आपको उसकी प्राप्तिके उपायका ही अनुष्ठान करना चाहिये और बाह्य विषयोंकी तृष्णाका परित्याग कर देना चाहिये—ऐसा इसका तात्पर्य है। |
| एष आत्मा भवतां स्वरूपम्। आत्मनो लक्षणम्। शृणुत तस्य लक्षणम्। अपहतपाप्मा, अपहतः पाप्मा धर्माधर्माख्यो यस्य सोऽयमपहतपाप्मा। तथा विजरो विगतजरो विमृत्युश्च। | यह आत्मा आपका स्वरूप है। आप उसका लक्षण सुनिये। अपहतपाप्मा—जिसका धर्माधर्मसंज्ञक पाप अपहत—नष्ट हो गया है वह यह ब्रह्म अपहतपाप्मा है। इसी प्रकार विजर—जिसकी जरावस्था बीत गयी है और मृत्युहीन है। |