छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished978 pages
Page 815 of 978
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खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८११
| समानम् । यच्चास्यात्मन आत्मीयत्वेन देहवतोऽस्ति विद्यत इह लोके, तथा यच्चात्मीयत्वेन न विद्यते; नष्टं भविष्यच्च नास्तोत्युच्यते । न त्वत्यन्तमेवासत्, तस्य हृद्याकाशे समाधानानुपपत्तेः ॥ ३ ॥ | स्थित हैं—इत्यादि शेष वाक्यका तात्पर्य भी इसीके समान है । इस देहवान् आत्माका आत्मीयरूपसे जो कुछ पदार्थ इस लोकमें है ओर जो कुछ 'आत्मीयरूपसे [ इस समय ] नहीं है, नष्ट हो गया है अथवा भविष्यमें नहीं होगा'—ऐसा कहा जाता है [ वह सब सम्यक् प्रकारसे इसीमें स्थित है ] । यहाँ अत्यन्त असत् वस्तुसे अभिप्राय नहीं है, क्योंकि उसकी तो हृदयाकाशमें स्थिति होनी ही सम्भव नहीं है ॥ ३ ॥ |
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तं चेद्ब्रूयुरस्मिँश्चेदिदं ब्रह्मपुरे सर्वँसमाहितँ सर्वाणि च भूतानि सर्वे च कामा यदैतज्जरा वाप्नोति प्रध्वँसते वा किं ततोऽतिशिष्यत इति ॥ ४ ॥
उस आचार्यसे यदि शिष्यगण कहें कि यदि इस ब्रह्मपुरमें यह सब समाहित है तथा सम्पूर्ण भूत और समस्त कामनाएँ भी सम्यक् प्रकारसे स्थित हैं तो जिस समय यह वृद्धावस्थाको प्राप्त होता अथवा नष्ट हो जाता है उस समय क्या शेष रह जाता है ? ॥ ४ ॥
| तं चेदेवमुक्तवन्तं ब्रूयुः पुनरन्तेवासिनोऽस्मिंश्चेद्यथोक्ते चेद्यदि ब्रह्मपुरे ब्रह्मपुरोपलक्षितान्तराकाश | किंतु यदि इस प्रकार कहनेवाले उस आचार्यसे शिष्यगण कहें कि यदि इस ब्रह्मपुरमें अर्थात् ब्रह्मपुरोपलक्षित अन्तराकाशमें यह सब सम्यक् प्रकारसे स्थित है तथा |