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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

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DevanagariSanskritpublished978 pages

Page 813 of 978

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Page 813

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८०९


| तत्स्थमन्तःकरणं पुण्डरीकाकाश- | करनेवाला उसका अन्तर्वर्ती अन्तः- |
| परिच्छिन्नं तस्मिन्विशुद्धे संहृत- | करण उस पुण्डरीकाकाशसे परि- |
| करणानां योगिनां स्वच्छ इवो- | च्छिन्न है। जिन्होंने अपनी इन्द्रि- |
| दके प्रतिबिम्बरूपमादर्श इव च | योंका उपसंहार कर लिया है उन |
| शुद्धे स्वच्छं विज्ञानज्योतिः- | योगियोंको उस विशुद्ध अन्तःकरणमें |
| स्वरूपावभासं तावन्मात्रं ब्रह्मो- | जलमें प्रतिबिम्बके समान तथा |
| पलभ्यत इति दहरोऽस्मिन्नन्तरा- | स्वच्छ दर्पणमें रूपके समान विशुद्ध |
| काश इत्यवोचामान्तःकरणोपा- | विज्ञानज्योतिःस्वरूपसे प्रतीत होने- |
| धिनिमित्तम्; स्वतस्तु-- | वाला ब्रह्म उसीके बराबर उपलब्ध |
| | होता है। इसीसे अन्तःकरणरूप |
| | उपाधिके कारण हमने यह कहा |
| | था कि इसका अन्तर्वर्ती आकाश |
| | अन्तःकरणरूप उपाधिके कारण |
| | सूक्ष्म है; स्वयं तो— |

यावान्वा अयमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाश उभे अस्मिन्द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिते उभावग्निश्च वायुश्च सूर्याचन्द्रमसावुभौ विद्युन्नक्षत्राणि यच्चास्येहास्ति यच्च नास्ति सर्वं तदस्मिन्समाहितमिति ॥ ३ ॥

जितना यह [ भौतिक ] आकाश है उतना ही हृदयान्तर्गत आकाश है। द्युलोक और पृथिवी—ये दोनों लोक सम्यक् प्रकारसे इसके भीतर ही स्थित हैं। इसी प्रकार अग्नि और वायु—ये दोनों, सूर्य और चन्द्रमा—ये दोनों तथा विद्युत् और नक्षत्र एवं इस आत्माका जो कुछ इस लोकमें है और जो नहीं है वह सब सम्यक् प्रकारसे इसीमें स्थित है ॥ ३ ॥