छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished978 pages
Page 780 of 978
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सप्तदश खण्ड
—: ॐ :—
विज्ञान ही जानने योग्य है
यदा वै विजानात्यथ सत्यं वदति नाविजानन्सत्यं वदति विजानन्नेव सत्यं वदति विज्ञानं त्वेव विजिज्ञासितव्यमिति विज्ञानं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
जिस समय पुरुष सत्यको विशेषरूपसे जानता है तभी वह सत्य बोलता है, बिना जाने सत्य नहीं बोलता; अपितु विशेषरूपसे जानने-वाला ही सत्यका कथन करता है। अतः विज्ञानकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये। [नारद—] ‘भगवन्! मैं विज्ञानको विशेष-रूपसे जानना चाहता हूँ’ ॥ १ ॥
| यदा वै सत्यं परमार्थतो विजानाति। इदं परमार्थतः सत्यमिति। ततोऽनृतं विकारजात वाचारम्भणं हित्वा सर्वविकारावस्थं सदेवैकं सत्यमिति तदेवाथ वदति यद्वदति। <br><br> ननु विकारोऽपि सत्यमेव। “नामरूपे सत्यं ताभ्यामयं प्राणश्छन्नः” (बृ०उ० १।६।३)। “प्राणा वै सत्यं तेषामेव सत्यम्” (बृ० उ० २।१।२०) इति श्रुत्यन्तरात्। | जिस समय पुरुष सत्यको परमार्थतः जानता है, अर्थात् ‘यह परमार्थतः सत्य है’ ऐसा जानता है उस समय वह वाणीपर अवलम्बित मिथ्या विकारजातको त्यागकर सम्पूर्ण विकारमें स्थित एक सत् ही सत्य है—ऐसा समझकर फिर जो कुछ बोलता है उसीको बोलता है। <br><br> शङ्का—किंतु विकार भी तो सत्य ही है, क्योंकि “नाम और रूप सत्य हैं, उनसे यह प्राण आच्छादित है”, “[वागादि] प्राण ही सत्य हैं, यह [मुख्य प्राण] उनका भी सत्य है”, इस अन्य श्रुतिसे भी [यही सिद्ध होता है]। |
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