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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished978 pages

Page 737 of 978

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Page 737

खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३३


शाङ्करभाष्यम्शाङ्करभाष्यार्थ
सम्पन्नानित्यर्थः । पशुपुत्रादिभिः प्रतितिष्ठतीति दर्शनात्स्वयं च प्रतिष्ठित आत्मीयोपकरणसम्पन्नोऽव्यथमानानमित्रादित्रासरहितानव्यथमानश्च स्वयमभिसिद्ध्यत्यभिप्राप्नोतीत्यर्थः । यावत्संकल्पस्य गतं संकल्पगोचरस्तत्रास्य यथाकामचारो भवति आत्मनः संकल्पस्य न तु सर्वेषां संकल्पस्येति । उत्तरफलविरोधात् । यः संकल्पं ब्रह्मेत्युपास्त इत्यादि पूर्ववत् ॥ ३ ॥सम्पन्न [लोकोंको]; क्योंकि वह पशु-पुत्रादिसे प्रतिष्ठित होता है—ऐसा देखा गया है, स्वयं भी प्रतिष्ठित—अपनी सामग्रीसे सम्पन्न होकर तथा अव्यथमान—शत्रु आदिके भयसे रहित लोकोंको स्वयं भी अव्यथमान—व्यथित न होता हुआ 'अभिसिध्यति'—सब प्रकारसे प्राप्त करता है—ऐसा इसका तात्पर्य है। जहाँतक संकल्पकी गति है अर्थात् संकल्पका विषय है वहाँतक इसकी स्वेच्छागति हो जाती है; जहाँतक उसके संकल्पकी गति होती है वहींतक, न कि सबके संकल्पकी गतितक, क्योंकि [ऐसा न माननेसे] आगे बतलाये हुए फलोंसे विरोध आवेगा । 'यः संकल्पं ब्रह्मेत्युपास्ते' इत्यादि मन्त्रका अर्थ पूर्ववत् है ॥ ३ ॥

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये
चतुर्थखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ४ ॥