छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished978 pages
Page 731 of 978
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चतुर्थ खण्ड
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मनसे संकल्पकी श्रेष्ठता
संकल्पो वाव मनसो भूयान्यदा वै संकल्पयतेऽथ मनस्यत्यथ वाचमीरयति तामु नाम्नीरयति नाम्नि मन्त्रा एकं भवन्ति मन्त्रेषु कर्माणि ॥ १ ॥
संकल्प ही मनसे बढ़कर है। जिस समय पुरुष संकल्प करता है तभी वह मनस्यन (बोलनेकी इच्छा) करता है और फिर वाणीको प्रेरित करता है। वह उसे नामके प्रति प्रवृत्त करता है; नाममें सब मन्त्र एकरूप हो जाते हैं और मन्त्रोंमें कर्मोंका अन्तर्भाव हो जाता है ॥१॥
| संकल्पो वाव मनसो भूयान्। | संकल्प ही मनसे बढ़कर है। |
|---|---|
| संकल्पोऽपि मनस्यनवदन्तःकरणवृत्तिः, कर्त्तव्याकर्त्तव्यविषयविभागेन समर्थनम्। विभागेन हि समर्थिते विषये चिकीर्षाबुद्धिर्मनस्यनं भवति। कथम् ? यदा वै संकल्पयते कर्त्तव्यादिविषयान् विभजत इदं कर्तुं युक्तमिति। अथ मनस्यति मन्त्रानधीयीयेत्यादि। अथानन्तरं वाचमीरयति | मनस्यनके समान संकल्प भी अन्तःकरणकी वृत्ति ही है, यानी कर्तव्य और अकर्तव्य विषयोंका विभागपूर्वक समर्थन ही संकल्प है। इस प्रकार विषयका विभागपूर्वक समर्थन होनेपर ही चिकीर्षाबुद्धि यानी मनस्यन होता है। सो किस प्रकार ?—जिस समय पुरुष संकल्प करता है अर्थात् 'यह करना चाहिये' इस प्रकार कर्तव्यादि विषयोंका विभाग करता है तभी वह सोचता है 'मैं मन्त्रोंका पाठ करूँ' इत्यादि। इसके पश्चात् वह मन्त्रादिका उच्चारण करनेमें |