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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

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DevanagariSanskritpublished978 pages

Page 720 of 978

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Page 720

| ७१६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७ |
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संस्कृत (शाङ्करभाष्यम्)हिन्दी अनुवाद
त्मेष्यते। नन्वात्माप्यात्मशब्दे-<br>नाभिधीयते; न, “यतो वाचो<br>निवर्तन्ते” (तै० उ० २।<br>४।१)। “यत्र नान्यत्पश्यति”<br>(छा० उ० ७।२४।१)<br>इत्यादिश्रुतेः।आत्मा माना नहीं जाता। यदि कहो कि आत्मा भी तो 'आत्मा' शब्दसे कहा ही जाता है तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि “जहाँसे वाणी लौट आती है” “जहाँ कोई और नहीं देखता” इत्यादि श्रुतिसे [उसका शब्दवाच्य न होना ही सिद्ध होता है]।
कथं तर्ह्यात्मैवाधस्तात्स आत्मे-<br>त्यादिशब्दा आत्मानं प्रत्या-<br>ययन्ति।शङ्का—तो फिर “आत्मा ही नीचे है”, “वह आत्मा है” इत्यादि शब्द किस प्रकार आत्माकी प्रतीति कराते हैं ?
नैष दोषः; देहवति प्रत्यगा-<br>अनात्मभावात् त्मनि भेदविषये<br>सदात्मप्रत्यय प्रयुज्यमानः शब्दो<br>देहादीनामात्मत्वे प्रत्याख्याय-<br>माने यत्परिशिष्टं सदवाच्यमपि<br>प्रत्याययति। यथा सराजिकायां<br>दृश्यमानायां सेनायां छत्रध्वज-<br>पताकादिव्यवहितेऽदृश्यमानेऽपि<br>राजन्येष राजा दृश्यत इति भवति<br>शब्दप्रयोगस्तत्र कोऽसौ राजेतिसमाधान—यह कोई दोष नहीं है। भेदके विषयभूत देहधारी प्रत्यगात्मामें प्रयोग किया हुआ ['आत्मा'—यह] शब्द, देहादिका आत्मत्व निरस्त हो जानेपर जो सन्मात्र अवशिष्ट रहता है उसे—यद्यपि वह [मुख्यवृत्तिसे किसी शब्दका] वाच्य नहीं है तो भी—[लक्षणासे] उसकी प्रतीति करा देता है, जिस प्रकार कि राजाके सहित दिखायी देती हुई सेनामें छत्र, ध्वजा और पताका आदिकी ओटमें राजाके दिखायी न देनेपर भी 'ये राजा दिखायी देते हैं' ऐसा प्रयोग होता है, फिर ऐसा प्रश्न होनेपर कि 'इनमें राजा कौन है?' राजा