छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
Page 497 of 978
Read in contextअष्टम खण्ड
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स्त्रीरूपा अग्निविद्या
योषा वाव गौतमाग्निस्तस्या उपस्थ एव समि-
द्यदुपमन्त्रयते स धूमो योनिरर्चिर्यदन्तः करोति
तेऽङ्गारा अभिनन्दा विस्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥
हे गौतम ! स्त्री ही अग्नि है। उसका उपस्थ ही समिध् है, पुरुष जो उपमन्त्रण करता है वह धूम है, योनि ज्वाला है तथा जो भीतरकी ओर करता है वह अङ्गारे हैं और उससे जो सुख होता है वह विस्फुलिङ्ग हैं ॥ १ ॥
| योषा वाव गौतमाग्निः । तस्या उपस्थ एव समित्, तेन हि सा पुत्राद्युत्पादनाय समिध्यते । यदुपमन्त्रयते स धूमः, स्त्रीसंभवादुपमन्त्रणस्य । योनिरर्चिर्लोहितत्वात् । यदन्तः करोति तेऽङ्गारा अग्निसंबन्धात् । अभिनन्दाः सुखलवा विस्फुलिङ्गाः क्षुद्रत्वात् ॥ १ ॥ | हे गौतम ! स्त्री ही अग्नि है। उसका उपस्थ ही समिध् है, क्योंकि उससे वह पुत्रादि उत्पन्न करनेके लिये समिद्ध होती है। पुरुष जो उपमन्त्रण करता है वह धूम है, क्योंकि उपमन्त्रणकी प्रवृत्ति स्त्रीसे ही होती है। लोहितवर्ण होनेके कारण योनि ज्वाला है तथा जो भीतरकी ओर करता है वह अग्निके सम्बन्धके कारण अङ्गारे हैं और अभिनन्द—सुखके कणमात्र क्षुद्र होनेके कारण विस्फुलिङ्ग हैं ॥ १ ॥ |
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