छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
Page 479 of 978
Read in contextखण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७५
| मानानां क्रमेण षष्ठाहुतिभूतानां ताः पुरुषवचसः पुरुषशब्दवाच्या भवन्ति पुरुषाख्यां लभन्ते ? इत्यर्थः । इत्युक्तो नैव भगव इत्याह, नैवाहमत्र किञ्चन जानामीत्यर्थः ॥ ३ ॥ | जिन छठी आहुतिभूत द्रव्योंका 'पुरुष' यही वचन यानी नाम है वे पुरुषवाची कैसे हो जाते हैं ? अर्थात् पुरुषसंज्ञा कैसे प्राप्त करते हैं ?' ऐसा कहे जानेपर उसने यही कहा— 'भगवन् ! नहीं; अर्थात् मैं इस विषयमें कुछ भी नहीं जानता' ॥ ३ ॥ |
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प्रवाहणसे पराभूत श्वेतकेतुका अपने पिताके पास आना
अथानु किमनुशिष्टोऽवोचथा यो हीमानि न विद्यात्कथंसोऽनुशिष्टो ब्रवीतेति। स हायस्तः पितुरर्धमेय्याय तँहोवाचाननुशिष्य वाव किल मा भगवानब्रवीदनु त्वाशिषमिति ॥ ४ ॥
'तो फिर तू अपनेको 'मुझे शिक्षा दी गयी है' ऐसा क्यों बोलता था ? जो इन बातोंको नहीं जानता वह अपनेको शिक्षित कैसे कह सकता है ?' तब वह त्रस्त होकर अपने पिताके स्थानपर आया और उससे बोला—'श्रीमान्ने मुझे शिक्षा दिये बिना ही कह दिया था कि मैंने तुझे शिक्षा दे दी है' ॥ ४ ॥
| अथैवमज्ञः सन्किमनु कस्मात्त्वमनुशिष्टोऽस्मीत्यवोचथा उक्तवानसि ? यो हीमानि मया पृष्टान्यर्थजातानि न विद्यान्न विजानीयात्कथं स विद्वत्स्वनुशिष्टोऽस्मीति ब्रुवीत ? इत्येवं स श्वेतकेतुं राज्ञायस्त आयासितः | 'तो फिर इस प्रकार अज्ञ होनेपर भी तूने 'मुझे शिक्षा दी गयी है' ऐसा कैसे कहा ? जो पुरुष इन मेरी पूछी हुई बातोंको नहीं जानता वह विद्वानोंमें 'मुझे शिक्षा दी गयी है' ऐसा कैसे कह सकता है ? इस प्रकार राजासे आयस्त—पीडित हो वह श्वेतकेतु अपने |