छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
Page 277 of 978
Read in context| खण्ड ११ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | २७३ |
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| तत्र कश्चिद्विद्वान्वस्वादिसमा-<br>नाचरणो रोहिताद्यमृतभोग-<br>भागी यथोक्तक्रमेण स्वात्मानं<br>सवितारमात्मत्वेनोपेत्य समा-<br>हितः सन्नेतं मन्त्रं दृष्ट्वोत्थितो-<br>ऽन्यस्मै पृष्टवते जगाद । यत-<br>स्त्वमागतो ब्रह्मलोकात्किं तत्रा-<br>प्यहोरात्राभ्यां परिवर्तमानः<br>सविता प्राणिनामायुः क्षपयति<br>यथेहास्माकमित्येवं पृष्टः प्रत्याह-<br>तत्तत्र यथापृष्टे यथोक्ते चार्थे<br>एष श्लोको भवति तेनोक्तो<br>योगिनेति श्रुतेर्वचनमिदम् ॥१॥ | वहाँ [ क्रममुक्तिमें ] जिसका आचरण वसु आदिके समान है और जो रोहितादि अमृतभोगका भाजन है ऐसे किसी विद्वान्ने उपर्युक्त क्रमसे आत्मभूत सूर्यको आत्मरूपसे उपलब्ध करते हुए समाहितचित्त हो इस मन्त्रका साक्षात्कार कर व्युत्थान होनेपर अपनेसे प्रश्न करनेवाले एक दूसरे व्यक्तिसे इस प्रकार कहा था । उससे जब यह पूछा गया कि 'तुम ब्रह्मलोकसे आये हो [ अतः बताओ तो ] क्या वहाँ भी सूर्य दिन-रात विचरता हुआ प्राणियोंकी आयुको क्षीण करता है जिस प्रकार कि वह यहाँ हमारी आयुका क्षय करता है ?' —तब उसने निम्नाङ्कित उत्तर दिया । 'इस प्रकार पूछे हुए उपर्युक्त प्रश्नके विषयमें उस योगीद्वारा कहा हुआ यह श्लोक है।' यह श्रुतिका वाक्य है॥ १॥ |
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ब्रह्मलोकके विषयमें विद्वान्का अनुभव
न वै तत्र न निम्लोच नोदियाय कदाचन ।
देवास्तेनाहꣳसत्येन मा विराधिषि ब्रह्मणेति ॥ २ ॥
वहाँ निश्चय ही ऐसा नहीं होता । वहाँ [ सूर्यका ] न कभी अस्त होता है और न उदय होता है । हे देवगण ! इस सत्यके द्वारा मैं ब्रह्मसे विरुद्ध न होऊँ ॥ २ ॥