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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished978 pages

Page 265 of 978

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Page 265

खण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यं २६१


संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
स विद्वान्यावदादित्यः पुरस्तात्प्राच्यां दिश्युदेता पश्चात्प्रतीच्यामस्तमेता तावद्वसूनां भोगकालस्तावन्तमेव कालं वसूनामाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता परितो गन्ता भवतीत्यर्थः । न यथा चन्द्रमण्डलस्थः केवलकर्मी परतन्त्रो देवानामनभूतः । किं तर्हि ? अयमाधिपत्यं स्वराड्भावं चाधिगच्छति ॥ ४ ॥जबतक आदित्य पूर्वकी ओर—पूर्वदिशामें उदित होता और पश्चिमकी ओर अस्त होता है तबतक वसुओंका भोगकाल है; वह विद्वान् उतने ही समयतक वसुओंके आधिपत्य और स्वाराज्यको 'पर्येता'—सब ओरसे प्राप्त होता है—ऐसा इसका भावार्थ है । जिस प्रकार चन्द्रमण्डलमें स्थित केवल कर्मपरायण पुरुष देवताओंका भोग्य होकर परतन्त्र रहता है उस प्रकार यह नहीं रहता । तो फिर किस प्रकार रहता है ? [ इसपर कहते हैं— ] यह तो आधिपत्य और स्वाराज्य—स्वराड्भावको प्राप्त हो जाता है ॥४॥

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये
षष्ठखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ६ ॥

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