छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
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Read in context| २५८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| तृप्यन्ति, दृशेः सर्वकरणद्वारोपलब्ध्यर्थत्वात् । | हैं, क्योंकि 'दृश्' धातु समस्त इन्द्रियोंद्वारा उपलब्धि (ज्ञान) होनेके अर्थमें प्रयुक्त होनेवाला है। |
| ननु रोहितं रूपं दृष्ट्वेत्युक्तम्, कथमन्येन्द्रियविषयत्वं रूपस्येति? | किंतु यहाँ तो कहा गया है कि रोहितरूपको देखकर [अर्थात् सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे उसका अनुभव कर<sup>१</sup>] फिर रूप अन्य इन्द्रियोंका विषय कैसे हो सकता है? |
| न; यशआदीनां श्रोत्रादिगम्यत्वात् । श्रोत्रग्राह्यं यशः। तेजोरूपं चाक्षुषम् । इन्द्रियं विषयग्रहणकार्यानुमेयं करणसामर्थ्यम्। | [इसपर कहते हैं—] ऐसी बात नहीं है, क्योंकि श्रोत्रादि अन्य इन्द्रियोंके विषय तो यश आदि हैं। यश श्रोत्रग्राह्य है, चक्षु इन्द्रियका विषय तेजोरूप है। विषयग्रहणरूप कार्यसे अनुमित होनेवाले करणोंके सामर्थ्यका नाम 'इन्द्रिय' है, |
| वीर्यं बलं देहगत उत्साहः प्राणवत्ता अन्नाद्यं प्रत्यहमुपजीव्यमानं शरीरस्थितिकरं यद्भवति । | 'वीर्य' का अर्थ है बल-देहगत उत्साह यानी प्राणवत्ता। तथा 'अन्नाद्य' जिसके आश्रित होकर प्राणादि प्रतिदिन जीवित रहते हैं और जो शरीरकी स्थिति करनेवाला है, वह है। |
| रसो ह्येवमात्मकः सर्वः। यं दृष्ट्वा तृप्यन्ति सर्वे । देवा दृष्ट्वा तृप्यन्तीत्येतत्सर्वं स्वकरणैरनुभूय तृप्यन्तीत्यर्थः। आदित्यसंश्रयाः सन्तो वैगन्ध्यादिदेहकरणदोषरहिताश्च ॥ १ ॥ | इस प्रकार यह सब कुछ रस है, जिसे देखकर सब देवता तृप्त होते हैं। 'देवगण देखकर तृप्त होते हैं—' इसका आशय यह है कि इन सबका अपनी इन्द्रियोंसे अनुभव करके वे तृप्त हो जाते हैं। तथा आदित्यके आश्रित होनेसे वे दुर्गन्ध आदि देह और इन्द्रियोंके दोषोंसे रहित भी हैं ॥ १ ॥ |
१. क्योंकि भाष्यमें 'दृश्' धातुका ऐसा ही अर्थ कहा गया है।