छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
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Read in contextखण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४७
| ऋङ्मधुकराभितापनिःसृत इत्युच्यते ।<br><br>यशो विश्रुतत्वं तेजो देहगता दीप्तिरिन्द्रियं सामर्थ्योपेतैरिन्द्रियैरवैकल्यं वीर्यं सामर्थ्यं बलमित्यर्थः, अन्नाद्यमन्नं च तदाद्यं च येनोपयुज्यमानेनाहन्यहनि देवानां स्थितिः स्यात्तदन्नाद्यमेष रसोऽजायत यागादिलक्षणात् कर्मणः ॥ २-३ ॥ | है ? जो ऋग्रूप मधुकरके अभितापसे निकला हुआ है—ऐसा कहा जाता है ।<br><br>उस यागादिरूप कर्मसे यश—विख्याति, तेज—देहगत दीप्ति, इन्द्रिय—सामर्थ्ययुक्त इन्द्रियोंके कारण—अविकलता, वीर्य—सामर्थ्य यानी बल और अन्नाद्य—जो अन्न हो और खाद्य (भक्ष्य) भी हो, जिसका प्रतिदिन उपयोग किये जानेपर देवताओंकी स्थिति हो उसे अन्नाद्य कहते हैं—ऐसा रस उत्पन्न हुआ ॥ २-३ ॥ |
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तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य रोहितꣳरूपम् ॥ ४ ॥
वह (यश आदि रस) विशेषरूपसे गया। उसने [जाकर] आदित्यके [पूर्व] भागमें आश्रय लिया। यह जो आदित्यका रोहित (लाल) रूप है वही यह (रस) है ॥ ४ ॥
| यशआद्यन्नाद्यपर्यन्तं तद्व्यक्षरद्विशेषेणाक्षरद्गमत् । गत्वा च तदादित्यमभितः पार्श्वतः पूर्वभागं सवितुरश्रयदाश्रितवदित्यर्थः । अमुष्मिन्नादित्ये संचितं | यशसे लेकर अन्नाद्यपर्यन्त वह रस ‘व्यक्षरत्’ विशेषरूपसे गया। उसने जाकर सूर्यको पार्श्वतः सूर्यके पूर्वभागको आश्रित किया, ऐसा इसका तात्पर्य है । हम इस आदित्यमें संचित हुए कर्मफलसंज्ञक |