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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished978 pages

Page 215 of 978

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Page 215

खण्ड २२ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ २११

भेतेन्द्रꣳशरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रति वक्ष्यतीत्येनं ब्रूयात् ॥ ३ ॥

सम्पूर्ण स्वर इन्द्रके आत्मा हैं, समस्त ऊष्मवर्ण प्रजापतिके आत्मा हैं, समस्त स्पर्शवर्ण मृत्युके आत्मा हैं। [इस प्रकार जाननेवाले] उस उद्गाताको यदि कोई पुरुष स्वरोंके उच्चारणमें दोष प्रदर्शित करे तो वह उससे कहे कि मैं इन्द्रके शरणागत हूँ; वही तुझे इसका उत्तर देगा ॥३॥

| सर्वे स्वरा अकारादय इन्द्रस्य बलकर्मणः प्राणस्यात्मानो देहावयवस्थानीयाः । सर्वे ऊष्माणः शषसहादयः प्रजापतेर्विराजः कश्यपस्य वात्मानः । सर्वे स्पर्शाः कादयो व्यञ्जनानि मृत्योरात्मानः । | अकारादि सम्पूर्ण स्वर, बल ही जिसका कर्म है उस इन्द्र यानी प्राणके आत्मा अर्थात् देह देहावयवस्थानीय हैं। श ष स ह आदि समस्त ऊष्मवर्ण प्रजापतिके अर्थात् विराट् या कश्यपके आत्मा हैं। क आदि (कवर्गसे लेकर पवर्ग तक) सम्पूर्ण स्पर्शवर्ण यानी व्यञ्जन मृत्युके आत्माके हैं। |
| तमेवंविदमुद्गातारं यदि कश्चित्स्वरेषूपालभेत स्वरस्त्वया दुष्टः प्रयुक्त इत्येवमुपालब्ध इन्द्रं प्राणमीश्वरं शरणमाश्रयं प्रपन्नोऽभूवं स्वरान्प्रयुञ्जानोऽहं स इन्द्रो यत्तव वक्तव्यं त्वा त्वां प्रति वक्ष्यति स एव देव उत्तरं दास्यतीत्येनं ब्रूयात् ॥ ३ ॥ | इस प्रकार जाननेवाले उद्गाताको यदि कोई पुरुष स्वरोंमें उपालम्भ दे—'तूने दोषयुक्त स्वरका प्रयोग किया है'—इस प्रकार उपालम्भ दिये जानेपर वह उसे यह उत्तर दे कि स्वरोंका प्रयोग करते समय मैं इन्द्र अर्थात् प्राणरूप ईश्वरके शरणागत—आश्रित था; अतः तुझे जो कुछ उत्तर देना होगा, वह इन्द्रदेव ही देगा ॥ ३ ॥ |

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