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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished978 pages

Page 108 of 978

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Page 108
१०४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

दोनोंका ही गान करता है। तथा वह इसके ही द्वारा जो इस (आदित्यलोक) से ऊपरके लोक हैं और जो देवताओंके भोग हैं, उन्हें प्राप्त करता है ॥ ७ ॥

| अथ य एतदेवं विद्वान्यथोक्तं देवमुद्गीथं विद्वान्साम गायत्युभौ स गायति चाक्षुषमादित्यं च । तस्यैवंविदः फलमुच्यते—सोऽमुनैवादित्येन स एष ये चामुष्मात्पराञ्चो लोकास्तांश्चाप्नोति आदित्यान्तर्गतदेवो भूत्वेत्यर्थो देवकामांश्च ॥ ७ ॥ | इस उपर्युक्त देवको जो इस प्रकार जाननेवाला पुरुष सामगान करता है वह चाक्षुष और आदित्य दोनों ही पुरुषोंको गाता है। इस प्रकार जाननेवाले उस उपासकको जो फल मिलता है वह बतलाया जाता है—वह यह उपासक इस आदित्यके द्वारा ही जो इससे ऊपरके लोक हैं उन्हें प्राप्त होता है। तात्पर्य यह है कि आदित्यान्तर्गत देवरूप होकर वह इन्हें और देवताओंके भोगोंको प्राप्त करता है ॥ ७ ॥ |


अथानेनैव ये चैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तांश्चाप्नोति मनुष्यकामांश्च तस्मादु हैवंविदुद्गाता ब्रूयात् ॥ ८ ॥
कं ते काममागायानीत्येष ह्येव कामागानस्येष्टे य एवं विद्वान्साम गायति साम गायति ॥ ९ ॥

तथा इसीके द्वारा जो इससे नीचेके लोक हैं उन्हें और मनुष्यसम्बन्धिनी कामनाओंको प्राप्त करता है। अतः इस प्रकार जाननेवाला उद्गाता [यजमानसे इस प्रकार] कहे—॥ ८ ॥ 'मैं तेरे लिये किन इष्ट कामनाओंका आगान करूँ' क्योंकि यह उद्गाता कामनाओंके आगानमें समर्थ होता है, जो कि इस प्रकार जाननेवाला होकर सामगान करता है, सामगान करता है ॥ ९ ॥