छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished978 pages
Page 105 of 978
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खण्ड ७] शाङ्करभाष्यार्थ १०१
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| अथ य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दृश्यते, पूर्ववत् । सैवर्गध्यात्मं वागाद्या पृथिव्याद्या चाधिदैवतम् । प्रसिद्धा च ऋक्पादबद्धाक्षरात्मिका तथा साम । उक्थसाहचर्याद्वा स्तोत्रं साम ऋक् शस्त्रमुक्थादन्यत् । तथा यजुःस्वाहास्वधावषडादि सर्वमेव वाग्यजुस्तत्स एव; सर्वात्मकत्वात्सर्वयोनित्वाच्चेति ह्यवोचाम । ऋगादिप्रकरणात्तद्ब्रह्मेति त्रयो वेदाः । | तथा यह जो नेत्रोंके मध्यमें पुरुष दिखलायी देता है—इस वाक्यका तात्पर्य पूर्ववत् समझना चाहिये। वही वागादि अध्यात्म और पृथिवी आदि अधिदैवत ऋक् है, जिसके पाद नियत अक्षरोंसे बँधे होते हैं वह ऋक् तो प्रसिद्ध ही है—तथा वही साम है। अथवा [इन ऋक् और साम शब्दोंका अर्थ इस प्रकार समझना चाहिये—] उक्थका सहचारी होनेसे स्तोत्र ही साम है और उक्थसे भिन्न जो शस्त्र (मन्त्रविशेष) हैं वे ही ऋक् हैं; तथा स्वाहा, स्वधा और वषट् आदि सम्पूर्ण वाक्य ही यजुः है। सर्वात्मक और सबका कारण होनेके कारण वह यजुः स्वयं पुरुष ही है—ऐसा हम पहले कह चुके हैं। यहाँ ऋगादिका प्रकरण होनेसे 'वही ब्रह्म है' इस वाक्यमें [ब्रह्म-शब्दसे] तीनों वेद समझने चाहिये। |
| तस्यैतस्य चाक्षुषस्य पुरुषस्य तदेव रूपमतिदिश्यते । किं तत् ? यदमुष्यादित्यपुरुषस्य । हिरण्मय इत्यादि यदधिदैवतमुक्तम् । यावमुष्य गेष्णौ पर्वणी तावेवास्यापि चाक्षुषस्य गेष्णौ । यच्चामुष्य नामोदित्युद्गीथ इति च तदेवास्य नाम । | उस इस नेत्रस्थ पुरुषका वही रूप बतलाया जाता है। वह रूप क्या है? जो रूप उस आदित्यान्तर्गत पुरुषका था, जिसका कि हिरण्मय आदि अधिदैवतरूपसे वर्णन किया गया था। जो उस (आदित्यपुरुष) के पक्ष थे वे ही इस नेत्रान्तर्गत पुरुषके भी पक्ष हैं। जो उसके 'उत्' अथवा 'उद्गीथ' आदि नाम थे, वे ही इसके भी नाम हैं। |