छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished978 pages
Page 101 of 978
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खण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९७
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| यत एवमुन्नामा चासावृक्सामगेष्णश्च तस्मादृक्सामगेष्णत्वप्राप्तमुद्गीथत्वमुच्यते परोक्षेण परोक्षप्रियत्वाद्देवस्य, तस्मादुद्गीथ इति। तस्मात्त्वेव हेतोरुदं गायतीत्युद्गाता। तस्माद्ध्येतस्य यथोक्तस्योन्नाम्नो गातासावतो युक्तोद्गातेति.नामप्रसिद्धिरुद्गातुः। | इस प्रकार क्योंकि वह 'उत्' नामवाला है तथा ऋक् और साम उसके पक्ष हैं, इसलिये ऋक्-साम-रूप पक्षोंवाला होनेसे उसमें प्राप्त उद्गीथत्वका परोक्षरूपसे प्रतिपादन हो जाता है; क्योंकि वह देव परोक्ष प्रिय* है। इसलिये वह उद्गीथ है ऐसा कहा। इसी हेतुसे, क्योंकि [यज्ञमें उद्गान करनेवाला] उत्का गान करता है इसलिये वह उद्गाता कहलाता है। इस प्रकार क्योंकि वह उपर्युक्त 'उत्' नामक देवका गान करता है इसलिये उद्गाताका 'उद्गाता' ऐसा नाम प्रसिद्ध होना उचित ही है। |
| स एष देव उन्नामा ये चामुष्मादादित्यात्पराञ्चः परागञ्चनादूर्ध्वा लोकास्तेषां लोकानां चेष्टे न केवलमीशितृत्वमेव चशब्दाद्धारयति च, “स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमाम्” (यजु० २५। १०) इत्यादिमन्त्रवर्णात्। किं च देवकामानामीष्ट इत्येतदधिदैवतं देवताविषयं देवस्योद्गीथस्य स्वरूपमुक्तम् ॥ ८ ॥ | वही यह उत् नामक देव इस आदित्यलोकसे परे जानेके कारण जो पराङ् यानी ऊपरके लोक हैं उन लोकोंका ईश्वर (शासक) है। वह केवल शासनकर्ता ही नहीं है 'च' शब्दसे यह भी सिद्ध होता है कि वह उनका धारण भी करता है; जैसा कि “उसने इस पृथ्वीको और द्युलोक-को धारण किया” इत्यादि मन्त्रवर्णसे सिद्ध होता है। यही नहीं, वह देवताओंकी कामनाओंका भी शासक है-इस प्रकार यह उस देवका--उद्गीथका अधिदैवत--देवताविषयक स्वरूप कहा गया ॥ ८ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये षष्ठखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ६ ॥
* देवताओंकी परोक्षप्रियता 'परोक्षप्रिया इव हि देवाः प्रत्यक्षद्विषः' इस श्रुतिसे प्रमाणित होती है।