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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

Page 93 of 1402

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Page 93

तृतीय ब्राह्मण

संस्कृत मूल / भाष्यहिन्दी अनुवाद
द्वया हेत्याद्यस्य कः सम्बन्धः ?<br><br>प्रकरण-सम्बन्धः — कर्मणां ज्ञानसहितानां परा गतिरुक्ता मृत्यात्मभावोऽश्वमेधगत्युक्त्या । अथेदानीं मृत्यात्मभावसाधनभूतयोः कर्मज्ञानयोर्यत उद्भवस्तत्प्रकाशनार्थमुद्गीथब्राह्मणमारभ्यते ।'द्वया ह' इत्यादि वाक्यसे आरम्भ होनेवाले इस ब्राह्मणका पूर्वब्राह्मणसे क्या सम्बन्ध है ?—<br><br>यहाँतक अश्वमेधकी गति (फल) बतानेके द्वारा ज्ञानसहित कर्मोंकी मृत्युस्वरूपताकी प्राप्तिरूप परागति बतलायी गयी है। अब आगे मृत्युस्वरूपताके साधनभूत कर्म और ज्ञानका जिससे उदय होता है उसका प्रकाशन करनेके लिये उद्गीथ ब्राह्मणका आरम्भ किया जाता है।
ननु मृत्यात्मभावः पूर्वत्र ज्ञानकर्मणोः फलमुक्तम्। उद्गीथज्ञानकर्मणोस्तु मृत्यात्मभावातिक्रमणं फलं वक्ष्यति अतो भिन्नविषयत्वात्फलस्य न पूर्वकर्मज्ञानोद्भवप्रकाशनार्थमिति चेत् ।**शङ्का—**पहले तो ज्ञान और कर्मका फल मृत्युस्वरूपताकी प्राप्ति बतलाया गया है; किंतु उद्गीथज्ञान और कर्मका फल मृत्युस्वरूपताका अतिक्रमण बतलाया जायगा। अतः इसके फलका विषय भिन्न होनेसे यह पूर्वोक्त कर्म और ज्ञानके उद्गम-स्थानको प्रकाशित करनेके लिये नहीं हो सकता।
नायं दोषः; अग्न्यादित्यात्मभावत्वादुद्गीथफलस्य । पूर्वत्राप्येतदेव फलमुक्तम् 'एतासां देवतानामेको भवति' इति । ननु 'मृत्युमतिक्रान्तः' इत्यादि**समाधान—**यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि उद्गीथका फल अग्नि एवं आदित्यस्वरूपताकी प्राप्ति है। पहले भी 'इनमेंसे कोई एक देवता हो जाता है' इस वाक्यसे यही फल बतलाया गया है। यदि कहो कि 'मृत्युसे अतिक्रान्त हो जाता है' इतना कथन तो पहलेकी अपेक्षा