बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
Page 88 of 1402
Read in context| ८२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| स्तूयते । यस्माच्च पुनस्तत्प्रवेशाद्गतयशोवीर्यत्वादमेध्यं सन्मेध्यमभूत्तदेव तस्मादेवाश्वमेधस्याश्वमेधनाम्नः क्रतोरश्वमेधत्वम् अश्वमेधनामलाभः । क्रियाकारकफलात्मको हि क्रतुः । स च प्रजापतिरेवेति स्तूयते ।<br><br>ऋतुनिर्वर्तकस्याश्वस्य प्रजापतित्वमुक्तम् 'उषा वा अश्वस्य मेध्यस्य' इत्यादिना । तस्यैवाश्वस्य मेध्यस्य प्रजापतिस्वरूपस्याग्नेश्च यथोक्तस्य ऋतुफलात्मरूपतया समस्योपासनं विधातव्यमित्यारभ्यते । पूर्वत्र क्रियापदस्य विधायकस्याश्रुतत्वात् क्रियापदापेक्षत्वाच्च प्रकरणस्य अयअर्थोऽवगम्यते । | है—इस प्रकार उसकी स्तुति की जाती है। क्योंकि उसके पुनः प्रवेशसे वह यशोवीर्यहीन और अमेध्य होनेपर भी मेध्य हो गया था इसीसे अश्वमेधका यानी अश्वमेधनामक यज्ञका अश्वमेधत्व है; अर्थात् उसे 'अश्वमेध' नाम मिला है। यज्ञ क्रिया, कारक और फलरूप होता है, अतः 'वह प्रजापति ही है' ऐसा कहकर उसकी स्तुति की जाती है।<br><br>'उषा वा अश्वस्य मेध्यस्य शिरः' इत्यादि वाक्यसे यज्ञनिर्वाहक अश्वका प्रजापतित्व कहा गया। अब उसी प्रजापतिरूप मेध्य अश्वकी और यज्ञफलरूपसे उसीके समान उपर्युक्त अग्निकी उपासनाका विधान करना है, इसलिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है। पहले श्रुतिवाक्यमें विधिबोधक क्रियापदका श्रवण नहीं हुआ है और [ उपासनासम्बन्धी वाक्योंमें ] क्रियापदकी अपेक्षा होती है; इसलिये इस प्रकरणका यह अर्थ जाना जाता है।१ |
१ यद्यपि पहले 'य एवमेतददितेरदितित्वं वेद' ऐसा विधायक वाक्य आया है, परंतु यह प्रकरण अश्वमेधोपासनाका है, इसलिये वह मुख्य वाक्य नहीं है। अतः उस अभावकी पूर्ति करनेके लिये वहाँ श्रुति 'एष ह वा अश्वमेधं वेद य एनमेवं वेद' इस प्रकार साक्षाद्रूपसे उसका विधान करती है।