बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
Page 879 of 1402
Read in contextब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ८६५
तस्य प्राची दिक् प्राञ्चः प्राणा दक्षिणा दिग् दक्षिणे प्राणाः प्रतीची दिक् प्रत्यञ्चः प्राणा उदीची दिगुदञ्चः प्राणा ऊर्ध्वा दिगूर्ध्वाः प्राणा अवाची दिग्वाञ्चः प्राणाः सर्वा दिशः सर्वे प्राणाः स एष नेति नेत्यात्मागृह्यो न हि गृह्यतेऽशीर्यो न हि शीर्यतेऽसङ्गो न हि सज्यतेऽसितो न व्यथते न रिष्यत्यभयं वै जनक प्राप्तोऽसीति होवाच याज्ञवल्क्यः । स होवाच जनको वैदेहोऽभयं त्वा गच्छताद् याज्ञवल्क्य यो नो भगवन्नभयं वेदयसे नमस्तेऽस्त्विमे विदेहा अयमहमस्मि ॥ ४ ॥
उस विद्वान्के पूर्व दिशा पूर्व प्राण हैं, दक्षिण दिशा दक्षिण प्राण हैं, पश्चिम दिशा पश्चिम प्राण हैं, उत्तर दिशा उत्तर प्राण हैं, ऊपरकी दिशा ऊपरके प्राण हैं, नीचेकी दिशा नीचेके प्राण हैं और सम्पूर्ण दिशाएँ सम्पूर्ण प्राण हैं। वह यह 'नेति-नेति' रूपसे वर्णन किया हुआ आत्मा अगृह्य है, वह ग्रहण नहीं किया जाता; वह अशीर्य है, शीर्ण (नष्ट) नहीं होता, असङ्ग है, उसका सङ्ग नहीं होता; वह अबद्ध है, व्यथित नहीं होता और क्षीण नहीं होता। हे जनक ! तू निश्चय अभयको प्राप्त हो गया है—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा। उस विदेहराज जनकने कहा, 'हे भगवन् याज्ञवल्क्य ! जिन आपने मुझे अभय ब्रह्मका ज्ञान कराया है, उन आपको अभय प्राप्त हो, आपको नमस्कार हो, ये विदेह देश और यह मैं आपके अधीन हैं ॥४॥
| तस्यास्य विदुषः क्रमेण वैश्वानरात्तैजसं प्राप्तस्य हृदयात्मानमापन्नस्य हृदयात्मनश्च प्राणात्मानमापन्नस्य प्राची दिक् प्राञ्चः प्राग्गताः प्राणाः, तथा दक्षिणा दिग् दक्षिणे प्राणाः, तथा प्रतीची | क्रमशः वैश्वानरसे तैजसको, उससे हृदयात्माको और हृदयात्मासे प्राणात्मभावको प्राप्त हुए उस इस विद्वान्के प्राची दिशा पूर्वगत प्राण हैं तथा दक्षिण दिशा दक्षिण प्राण |
बृ० उ० ५५—